Wednesday, 1 November 2017

पत्रकार जब राजनीतिक दल का समर्थक बनता है तब ऐसे ही हालातों का सामना करना पड़ता

राजेश रावत, 2 नवंबर 2017 भोपाल । छत्तीसगढ़ के पत्रकार विनोद वर्मा की गिरफ्तारी के साथ एक बार फिर पत्रकार बनाम राजनीतिक दल के समर्थक पत्रकार का मुद्दा फिर केंद्र में आ गया है। पर ज्यादातर पत्रकार इस पर बोलने से बचना चाहते हैं, क्योंकि उनकी प्रतिबद्धता कहीं न कहीं, किसी न किसी दल के साथ जुड़ी होती है। अगर न भी हो तो उनका झुकाव एक विशेष दल की तरफ तो होता ही है। बस यही पत्रकारिता के लिए घातक है। निष्पक्ष कभी कोई नहीं होता है। न ही आज तक कोई रहा है। रहना भी नहीं चाहिए। पर अपने पेशे और विचारधारा के बीच विभाजन साफ होना चाहिए। ईमानदार होना जितना जरूरी है, उससे ज्यादा अहम है आपका ईमानदार दिखना और इसकी कसौटी पर खऱा उतरना। परीक्षा तो पग-पग पर देनी होगी। बस हर बार परिस्थितियां अलग होंगी। इसका मतलब है कि आप भले ही किसी भी विचारधारा का समर्थन करें। पर आपके काम,व्यवसाय से इतर। दोनों के बीच इतनी बारीक रेखा है कि आपको हमेशा इतना सतर्क रहना चााहिए जितना सीमा पर जवान रहता है। एक चूक और गोली आर-पार। यानी आपकी जीवनभर की मेहनत और पूजी पानी हो गई। फिर आप जमाने को सफाई देते थक जाएं। पर पहले वाला भरोसा हासिल नहीं कर पाएं। देश में अधिकांश पत्रकार इस बारीक लक्ष्मण रेखा को जाने-अनजाने में कब पार कर जाते है कि उन्हें पता ही नहीं चलता है। जिन्हें पता होता है वे इस स्थिति का भरपूर दोहन करते हैं और लाभ और हानि भी उठाते हैं। विनोद वर्मा को लेकर भी यह हालात बने हैं। उन्होंने लक्ष्मण रेखा लांघी या जब लांघ चुके तब पता चला यह तो वही जाने। लेकिन इसके बाद भी हालात उनके हाथ से नहीं निकले होंगे। ऐसा मेरा मानना है। क्योंकि कोई न कोई बचाव का रास्ता हमेशा खुला होता है। बस आपको उसके लिए मेहनत करनी होती है। कभी कम तो कभी बुरी तरह से थका देने वाली। परिणाम सदैव मंशा के अनुरूप ही आता है। मेरा विषय यह भी नहीं है कि वे निर्दोष या दोषी है। सही हैं या गलत। मैं तो बस यह कहना चाहता हूं कि ऐसे हालात बनने की नौबत ही न आने दें। यह सबके हाथ में होता है। हम शुतुरमुर्ग की तरह आंख बंद करके रेगिस्तान में गर्दन डालकर बैठेंगे तो ऐसे ही हालात मिलेंगे। अगर कोई राजनीतिक दल का समर्थक बनकर काम करना चाहता है तो बने। किसी को क्या आपत्ति हो सकती है। कोई सवाल नहीं कर सकता। पर इस अवस्था में नफा और नुकसान के लिए तैयार रहें, जैसे गुजरात में अहमद पटेल उठा रहे हैं। गुजरात में एक मुख्यमंत्री के तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी ऐसी ही कीमत साल तक चुकाई और चुका रहे हैं। क्योंकि राजनीति के शिखर पर कीमत तो चुकानी ही पड़ती है। यह बात अलग है कि किसी भी क्षेत्र में शिखर तक बगैर कीमत चुकाए कोई नहीं पहुंच सकता या बना रह सकता है। इसका उदाहरण महाभारत है। श्रीकृष्ण ने पूरे यु्द्ध के दौरान कोई हथियार नहीं उठाया। लेकिन राजनीतिक दांव-पेंच चलते रहे। उन्हें हर चाल की कीमत चुकानी पड़ी। युद्ध भले पांडवों ने जीता। पर केंद्र में श्रीकृष्ण ही रहे। इसकी कीमत उन्हें अपने पूरे कुनबे की कुर्बानी देकर चुकानी पड़ी।

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