Monday, 11 May 2015

फिर याद आ गया धमकी का जमाना


-राजेश रावत
केजरीवाल ने मीडिया के खिलाफ मानहानि का केस करने की धमकी दी। दिल्ली के अधिकारियों को इसके संबंध में निर्देश भी जारी कर दिए हैं। इस खबर के बाद से देश भर का मीडिया बौखला गया है। हालांकि ऐसी कोई बात नहीं है। जो केजरीवाल ने नई की हो। पर मीडिया को लगता है कि केजरीवाल के बहाने बाकी राजनेताओं को भी वे इस तरह के हथियारों के इस्तेमाल करने से रोक सकते हैं।

फोटो : साभार गूगल
कुछ दिनों पहले मीडिया को मोदी ने सलाह दी थी। जमकर आलोचन की थी। मीडिया इससे आहत तो जबरदस्त हुआ था। पर इस तरह से विरोध नहीं कर पाया था। शायद हिम्मत ही नहीं थी। क्योंकि मोदी जी अभी सरकार हैं और इससे भी ज्यादा उनके आर्थिक हित भी नाराजगी ज्यादा नहीं जताने का तकाजा करते हैं। मीडिया डरा कभी नहीं। बस मौके के इंतजार में है। मोदी सरकार के घोटाले और घपले खोजने में जुटा है।

मीडिया को अब दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की धमकी सहन नहीं हो रही है। कैसे एक अदने से दल का नेता जो हाल ही में राजनीति में आया है। उन्हें कैसे धमकी दे सकता है। कई मीडिया हाउस को लग सकता है कि केजरीवाल को उन्होंने ही नेता बनाया है। अब मुख्यमंत्री बनकर उन्हें ही आंखे दिखाने लगे हैं। मीडिया हाउस की बात तो छोड़िए कोई भी इसे सहन नहीं करेगा। आदेश जारी करने से पहले मेरा मानना है कि केजरीवाल यह जानते थे। संभव है दिल्ली के अधिकारियों ने उन्हें इसके संबंध में अपने -अपने अनुभवों की राय भी दी हो। मेरा मानना है कि बहुमत इस हथियार के इस्तेमाल करने को लेकर ही होगा। क्योंकि वर्षों से सरकारें इस हथियार का इस्तेमाल पत्रकारों पर करती आई हैं।

न हथियार की धार बोथराई है और न ही मीडिया या पत्रकार हाउस इससे डरे सहमें है। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी भी इस हथियार को आजमा चुकी हैं। पर इसका दूसरा असर जबरदस्त हुआ है। शायद कम लोग जानते हैं। वह यह है कि फर्जी तरीके से खबरें गढ़ने वाले और उन्हें मीडिया या पत्रकार को हथियार बनाकर इस्तेमामल करने वाले दडबों में छिप जाते हैं। इस बार भी ऐसा ही होगा। केजरीवाल को परेशान और जबरन बदनाम करने वाले एक कोने में जाकर बैठ जाएंगे। क्योंकि वे जानते हैं कि सनसनी के चक्कर में कोई भी मीडिया हाउस और पत्रकार उनकी बनावटी या फर्जी खबर के तथ्य को जांचे बगैर आगे नहीं बढ़ाएगा। जो आगे बढ़ाएंगे। इसकी कीमत भी मुहंमांगी वसूलेंगे।

मतलब पहले 10 गलत और फर्जी खबरें आती थी उनकी संख्या दो हो जाएगी। इनसे निपटना केजरीवाल और उनकी टीम के लिए आसान होगा। केजरीवाल भी यही चाहते हैं। नई सरकार को कुछ काम करने के लिए मिले और मीडिया का ध्यान उनकी तरफ से हट जाए। मीडिया उनका अघोषित बहिष्कार करे। ताकि विरोधियों से निपटने में लगने वाली ऊर्जा को वे कहीं और लगा सकें। बौखलाया मीडिया अब केजरीवाल सरकार के खिलाफ शांत नहीं बैठेगा। बस घोटाले और गड़बड़ियों की पोल खोलने के लिए लू पोल तलाशने में जुट जाएगा। सबूत हाथ में आने के बाद जोर-शोर से मामले को उठाएगा। केजरीवाल इस खतरे को जानते हैं। पर वे इस इसे उठाने को तैयार हैं। क्योंकि इसे उठाए बगैर उनका गुजारा नहीं हो सकता है।

 इतना सब लिखने के पीछे मेरा हरियाणा की चौटाला सरकार के दौरान का अनुभव है। 2000 में जब मैं हरियाणा में था तब चुनाव से पहले और चुनाव के बाद पांच साल के दौरान इसी तरह के वाकये से दो चार हुआ था। इंडियन नेशनल लोकदल की सरकार जो मीडिया फ्रेंडली थी सत्ता में आते ही मीडिया विरोधी हो गई थी।

हमारा अखबार नया था। इसलिए अनेक तरह के हथकंडे हम पर ही अजमाए जा रहे थे। पर हर बार हमारी सतर्कता के चलते कुछ नहीं बिगड़ता था। बाकी मीडिया हाउस भी इसी तरह से चौंकन्ने हो गए थे। तब कुछ पत्रकारों से गलतियां भी हुई और वे सरकार की कोप दृष्टि का शिकार भी बने। पर समय बीतते वही चौटाला सरकार मीडिया फ्रेंडली बन गई । इसमें वहां के अधिकारियों का बड़ा हाथ था। मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला उनके कहने पर ही मीडिया विरोधी और समर्थक बने थे। मेरे कुछ आईएएस और आईपीएस अफसरों से ठीक-ठाक संबंध थे। उन्होंने अनुभव बांटतें हुए बताया था कि कैसे सरकारी अफसरों ने चौटाला को मीडिया से दूरी बरतने के फायदे और मीडिया के साथ चलने के नुकसान बताए थे। यानि उसी तरह से राज्य और अधिकारी बदले हैं पर हथकंड़ा वही अंग्रेजों के जमाने का है। जो अफसरों को उनकी अकादमी में बताया और सिखाया जाता है।

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