Sunday, 13 April 2014

संजय बारू ने केवल किताब बेचने की सफल रणनीति को अंजाम दिया



प्रधानमंत्री के पूर्व मीडिया सलाहकार संजय बारू की किताब "द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर — द मेकिंग एंड अनमेकिंग आफ मनमोहनसिंह " किताब को बेचने की एक सोची -समझी रणनीति का हिस्सा ही है। इस किताब में भी बहुत कुछ साफ किया गया है कि वह उस समय की चर्चा पर आधारित है। पीएमओ भी साफ कर चुका है कि संजय बारू की बात पर भरोसा नहीं किया जाना चाहिए। हालांकि उनकी किताब की सूचनाओं को पूरी तरह से खारिज करना ठीक नहीं है। 

चुनाव के समय आना संदेह ः चुनाव के ठीक पहले किताब का आना कई संदेहों को जन्म देता है। भाजपा इसका राजनीतिक लाभ तो उठाएगी ही। संजय बारू मीडिया से जुड़े रहे हैं। वे कितने साफ -सुधरे अधिकारी रहे हैं। इस पर खुलासा अभी नहीं हुआ है। आने वाले समय में होने पर साफ होगा। वे भाजपा से नहीं मिलें हो इसका कोई प्रमाण नहीं है। जिस तरह से अधिकारी और सेना से जुड़े लोग लाभ लेने के उद्देश्य से भाजपा से जुड़ रहे हैं संजय बारू का प्रयास भी इसी कड़ी का हिस्सा हो सकता है। वैसे भी अधिकारियों का कोई इमान धरम नहीं होता है। जो सत्ता में आता है उसके साथ हो जाते हैं। इसके प्रमाण सत्यपाल सिंह, वीके सिंह जैसे लोगों ने जनता को दिया है। 

किताब बेचने की पुरानी रणनीति ः जो लोग इस तरह की किताबों का इतिहास जानते हैं उन्हें पता है कि जब तब कई अधिकारी इस तरह से अपनी किताबों को लोकप्रिय बनाने के लिए इस तरह के हथकंडे इस्तेमाल करते रहे हैं। आज भाजपा एक अधिकारी पर इतना भरोसा जताकर मनमोहन और सोनिया से जबाव मांग रहे हैं। तो मोदी पर आरोप लगाने वाले अधिकारियों पर कांग्रेस से मिले होने के आरोप लगाते समय चुप क्यों हो जाते हैं। दंगों को लेकर मोदी पिछले कई सालों से इस तरह के आरोप झेल रहे हैं। एक महिला की जासूसी का मामला भी तो एक पूर्व कलेक्टर ने ही उठाया था। तो क्या वह सही है। दंगा में मामले में संजीव और अन्य अधिकारी सही हैं क्या। किरण बेदी भी अन्ना का साथ छोड़कर भाजपा का दामन थाम चुकी हैं।

एनकाउंटर में अमित शाह भी दोषी हैं क्या ः गुजरात के एनकाउंटर में अमित शाह जो तब गृहमंत्री थे। उन पर भी आरोप लगे हैं। इसका मतलब यह लगाया जाए कि जो अधिकारी उन पर आरोप लगा रहे हैं वे सहीं बोल रहे हैं। मोदी ने वास्तव में दंगों में पुलिस को कार्रवाई करने से रोका था। अगर यह सब आरोप झूठे और बेबुनियाद है तो संजय बारू के आरोप लगत है और अगर यह आरोप सहीं तो संजय बारू के आरोप को भी इसी संर्दभ में देखा जाना चाहिए। मेरा उद्देश्य न तो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को बेदाग या सोनिया गांधी का बचाव करना है। बल्कि उन तथ्यों को सामने रखना है जो देश में इस समय जनता को गुमराह करने के लिए बताए जा रहे हैं।आप नेता अरविंद केजरीवाल पहले ही कह चुके हैं कि भाजपा और कांग्रेस एक ही थाली के चट्टे-बट्टे हैं। दोनों ही लोगों को केवल गुमराह करने की कोशिश में लगे रहते हैं। भाजपा कांग्रेस को सत्ता से दूर करने में जीजान से जुटी हुई है और कांग्रेस किसी भी कीमत पर उसे बहुमत में आने से रोकने में। कांग्रेस जानती है कि उसे सत्ता नहीं मिलने वाली है। परन्तु वह भाजपा को सत्ता में काबिज होते हुए भी सहन नहीं कर पा रही है। बस यही लड़ाई दोनों दलों के बीच चल रही है। केजरीवाल का चीर हरण भी कांग्रेस नेताओं ने इसीलिए कराया है। हालांकि राहुल ने उनकी तारीफ करने पुराने और घाव कांग्रेसियों को नसीहत देने की कोशिश की थी। लेकिन उनकी तमाम कोशिशों को इन नेताओं ने भाजपा के साथ मिलकर रसातल में पहुंचा दिया है। अन्ना हजारे को इतना कन्फ्यूज किया कि वे केजरीवाल से न सिर्फ दूर हो गए। बल्कि दुश्मन की तरह देखने लगे हैं।


इन दिनों महाभारत का जादू चल रहा घरों में


80 -90 के दशक में जब रामायण और महाभारत सीरियल टेलीविजन पर शुरू हुआ था। तब देश में अलग माहौल था। रविवार को प्रसारित होने के समय देश भर के गांवों और कस्बों में स्वतः कफर्यू लग जाता । हर एपिसोड का लोग एक सप्ताह तक इंतजार करते थे। सप्ताह भर चर्चा होती रहती थी। तब आस्था का मामला था। टीवी का क्रेज का दौर था। उसके बाद कई बार दोनों टीवी सीरियल आ चुके हैं। इस बार महाभारत का नया संस्करण चल रहा है। रौचकता के साथ कलाकार नए हैं। इतना ही क्रेज इस बार देखने को मिला। आश्चर्य स्वभाविक था। 

गहराई से जाकर पता किया तो घोर आश्चर्य हुआ। नई पीढ़ी रामायण और महाभारत को एक स्टोरी की तरह समझाना चाहती है। या यह कहें कि जिन बच्चों ने केवल पढ़ा है या सुना है वह इसे देखना चाहते हैं। ताकि समझ सकें। यह उमंग उसी तरह की है जिस तरह का उत्साह 80-90 के दशक में था। बस फर्क है तो उनकी समझ का। उस दौर में लोग टेक्नालॉजी के प्रयोग को आंखे फाड़कर और दांतों तले उंगली दबाकर देखते थे। आज का युवा जानता है कि तकनीक से इमेज ग्राफिक आसानी से बनाए जा सकते हैं। उसे इनके प्रयोग से आश्चर्य नहीं होता। न ही वह किसी अंधविश्ववास में फंसता है। वह पुरानी जड़ों से जुड़ रहा है।  

स्कूलों और कॉलेजों में इस पर बाकायदा चर्चा होती है। पूरी कहानी को टीवी पर घटते हुए देखने से उसकी रुचि लाइव देखने से बढ़ जाती है। अभिनय करते पात्र उसे अपने दौर के कलाकारों की तरह कनेक्ट करते हुए लगते हैं। युवाओं के इस तरह के दर्शकों में अंग्रेजी स्कूलों के छात्र-छात्राओं की संख्या ज्यादा है। वे इतने सजग हैं कि संवादों की छोटी से छोटी गलती, रुकावट, अटकाव और भटकाव पर भी चर्चा करते हैं। किस कलाकार की ड्रेस उस पर कितनी जंची और किस कलाकार पर नहीं। उसकी आलोचना और सराहना करने से पीछे नहीं हटते हैं। 

यानि महाभारत और रामायण हर दौर के युवाओं को प्रभावित करती रहेगी। यह देश के लिए अच्छा ही है। युवा अपनी जड़ों के साथ जुड़कर गर्व महसूस कर रहे हैं। इसे इन दोनों महाकाव्यों उपललिब्ध माना जाना चाहिए। इन्हें गढ़ने की कालाकारी । कालजयी रचनाएं इसी तरह से हर युग में प्रभावित करती रही हैं। बस जरूरत है उन पर धर्म का मुल्लामा नहीं चढ़ाया जाए। वर्ना 90 के अंत के बाद से समझदार लोगों ने जिस तरह से इनसे दूरी बनाना शरू की थी। वह आगे भी बनती रहेगी। एक दौर एेसा भी था जब रामायण और महाभारत का जिक्र करने वाले से लोग कन्नी काटने लगते थे। वे उसे धर्म भूरी समझते थे। नए दौर का दुश्मन। जबकि कभी भी उसने न तो मंदिर जाना छोड़ा था और न ही पूजा -पाठ या भगवान को मानना बंद किया था। बस सार्वजिनक रूप से स्वीकारने से बचने लगा था।

Sunday, 6 April 2014

स्टेशन पर पहली बार मतदान की अपील
देश में चुनाव का प्रचार इस बार चरम पर था। शायद पहली बार मैंने चार रात को साढ़े तीन बजे भोपाल रेलवे स्टेशन पर मतदान की अपील चुनी। वह भी प्लेटफार्म नंबर पांच पर। स्टेशन पर रेल आने की घोषणा करने वाले माइक से हो रहा था प्रचार। मेरे समेत कई लोगों के आश्चर्य में थे। परन्तु एक सुखद आश्चर्य जरूर था। चलो देश के नेताओं को आम लोगों का डर तो है। मेरा अनुमान है कि यह प्रचार केवल चुनाव आयोग की एक पहल भर का नतीजा नहीं है। बल्कि उन तमाम राजनेताओं के  डर का परिणाम है जो मतदाताओं से घबराए हुए हैं।

चुनिए उसे जो सही और सच्चा हो
सोमवार से देश में मतदान का दौर शुरु हो जाएगा।  पहले चरण में  असम और त्रिपुरा की छह सीटों पर मत डाले जाएंगे। देश ने आरोप और प्रत्योरोपों का दौर देखा। झूठे और सच्चे वादों से भरे इरादे देखे। भ्रमित करने के तमाम कोशिशें नेता कर चुके हैं। सोशल मीडिया से लेकर प्रचार के सभी माध्यमों को उपयोग और दुरुपयोग का दौर भी चला। कुछ लोग प्रयार की बयार में बहे तो कुछ देखो और इंतजार की जर्त पर चुप रहे। अब समय चुप नहीं रहने का है। बस अपने इरादों को जाहिर करने का है। चाहे किसे भी चुनें पर इतना जरूर ध्यान रखें कि जिसे आप चुन रहे हैं वह आपकी कसौटी पर खरा उतरने के कुछ मापदंड तो पूरा करने में सक्षम जरूर ही हो।