Sunday, 23 August 2015

पाकिस्तान से वार्ता विफल : न तुम हारे न हम जीते

  • राजेश रावत भोपाल
23 अगस्त 2015 (इमेज 23 अगस्त का
 दैनिक भास्कर)

-दोनों देशों के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार स्तर की वार्ता विफल

हिंदुस्तान और पाकिस्तान दो अजीब पड़ोसी हैं। बातचीत करना भी चाहते हैं और नहीं भी करना चाहते हैं। पाकिसान में सेना के हाथ में सत्ता का संचालन है। भारत में सबसे बड़े दल के पास। जिसे देश के 125 करोड़ लोगों को समर्थन हासिल है। इस पूरी बातचीत में दोनों में फर्क नजर नहीं आया।

कूटनीति के मंच पर दोनों ही देश के कर्णधार अपनी पीठ थपथपा रहे हैं। पाकिस्तान के हुकुमरान भीतर खाने सोच रहे हैं कि हम भारत के झांसे में नहीं आए हैं। बात नहीं करना थी। तो नहीं गए। भारत के कर्णधार सोच रहे हैं। नहीं बुलाना था। बस दुनिया भर को बताना था। हम तो बात करना चाहते थे। पाकिस्तान तैयार नहीं हुआ। यानि न तुम जीते न हम हारे।

क्या वास्तव में दुनिया भर के कूटनीति पर नजर रखने वाले और करने वाले इतने नासमझ होंगे। जो इन दोनों देशों के सत्ताधारियों के बनावटी खेल को नहीं समझ रहे होंगे। वे जानते हैं दोनों देश केवल अपने लोगों को गुमराह कर रहे हैं। उनका ध्यान हटाने के लिए कई दिनों से बातचीत करने का झांसा दे रहे थे। समय पर दोनों ने अपने -अपने देश के लोगों के सामने कूटनीतिक चालें चली। जनता को गुमराह किया और चुप बैठ गए। असल में दुनिया के दूसरे देश भी नहीं चाहते हैं कि एशिया में शांति रहे। क्योंकि इसे उनका हथियार समेत अन्य कारोबार ठप हो जाएगा। शांति होने पर यहां के लोगों का ध्यान बेसिक समस्याओं पर जाएगा। वे आर्थिक गुलामी के झांसे में नहीं आएंगे।

बस चुपचाप देखते रहे। दोनों देशों के अपने -अपने समर्थक हुक्मरानों को निर्देश देते रहे। बातचीत का नाटक पूरी तरह से फिल्म होना चाहिए। जनता का इससे मनोरंजन होना चाहिए। रही सही कसर सेना के तमाम अफसरों ने कर दिया। वे जवानों की मौत से आक्रोशित हैं। पर उसे रोकने के लिए होने वाले हर प्रयास और उसके पीछे की कूटनीति में हमेशा उलझ जाते हैं।

यानि जवान तो अभी भी उसी तरह से सरहद में अपने प्राण न्यौछावर करते रहेंगे। पाकिस्तान इस तरह की कूटनीति को करता ही रहेगा। क्योंकि वहां के अंदरूनी हालात बेहद खराब हैं। वह लोगों को भारत के खिलाफ भड़काकर ही उनका ध्यान हटाए रखना चाहता है। सेना अपनी पकड़ इसी डर को भुनाकर बनाए रखना चाहती है। पर भारत हर बार की तरह पाकिस्तान की कूटनीति में उलझ गई। पाकिस्तान कश्मीर को अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बनाने की तमाम कोशिशों में लगातार सफल हो रहा है। लेकिन भारत के पास इसका कोई तोड़ नहीं है।
भारत कश्मीर मुद्दे को गौण बनाने के लिए कोई रणनीति नहीं बना पाता है। नेहरू के समय से अब तक कोई भी राजनेता इस मुद्दे को गौण नहीं बना पाया है। बल्कि अलगाव वादी लगातार ताकतवर होते जा रहे हैं। भारत केवल रुतबे से उनको दबाने की कोशिश करता है।

दुनिया के देश भारत के दवाब में आती तो है पर पाकिस्तान को नजर अंदाज नहीं करती है। चीन ने भारत को घेरने के लिए पाकिस्तान को लगातार मदद दे रही है। तब भारत को एक नई रणनीति के तहत कश्मीर मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बनने से रोकने के लिए प्रयास करना होगा। तब ही यह मुद्दा अंतरराष्ट्रीय नहीं बनेगा। वरना आने वाले समय में दुनिया के लोग भारत का साथ छोड़ देंगे। क्योंकि वहां उनके आर्थिक हित सधने लगेंगे। तब भारत के पास कोई विकल्प नहीं होगा। जरूरत है कि भारत वहां के हालात पर नए नजरिये से सोचे और कूटनीति उसी तरह से बयान।

बोल्ट की जीत से मिलते सबक

राजेश रावत- फोटो गूगल से साभार 
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-कोई भी अपराजित नहीं है
-चुनौती पर कैसे पाए विजय
जमैका के फराटा एथलीट उसैन बोल्ट ने वर्ल्ड एथलेटिक्स में 100 मीटर दौड़ तीसरी बार जीती है। वे कार्ल लुईस आैर मॉरिस ग्रीन पर पहुंच गए हैं। दुनिया का धावकों के लिए यह क्षण एेतिहासिक था। पूरी दुनिया की निगाह इस रेस पर लगी थी। रेस शुरू होने से पहले पूरी दुनिया में इस रेस को देखा जा रहा है। कारण साफ था क्या बोल्ट अपना करिश्मा बरकरार रख पाते हैं या उन्हें कड़ी चुनौती देने वाले अमेरिका के जस्टिन गैटलिन अपना 29 वां अपराजेय अभियान जारी रख सकेंगे। गैटलिन अभी तक 28 रेस में एक बार भी नहीं हारे हैं।  लगभग दो साल से विजेता बने हुए हैं।
कोई हमेशा अपराजित नहीं रह सकता है। यह गैटलिन ने 28 रेस जीतकर साबित किया है। वे अपने लक्ष्य को पाने में सफल रहे। इस रेस में भी उसी जज्बे के साथ उतरे थे। परन्तु रेस शुरू होने से ऐन पहले उनके चेहरे पर विश्व विजेता बनने का भाव नहीं था। जबकि उसैन ने रेस शुरू होने से पहले अपना नाम पुकारे जाने पर लोगों का अभिवादन विश्व विजेता की तरह ही किया। यही कारण था कि गैटलिन बोल्ट के लिए सबसे बड़ी चुनौती होने के बाद भी नए हीरो की तरह नहीं देखे गए। पूरे समय लोगों का ध्यान बोल्ट पर ही रहा। मसलन आप किसी चुनौती को स्वीकारते हैं तो व्यवहार भी वैसा ही करना होगा। देखने वालों और प्रतिव्दंदी को लगना भी चाहिए कि उसके सामने टक्कर देने वाला बगैर मानसिक दबाव के खेल रहा है। यह संकेत बोल्ट ने दिया। पर गैटलिन चूके। ऐसा नहीं है कि बोल्ट उन्हें कम आंक रहे थे। वे जानते थे कि अगर थोड़ा भी चूके तो वे पिछड़ जाएंगे। दवाब की बानगी थी कि वे एक बार दौड़ते समय लड़खड़ा भी गए थे। पर जीतने का जज्बा ही किसी को हार या जीत दिलाता है। पिछड़ने और लड़खड़ाने के बाद भी उसैन ने रेस में न सिर्फ बराबरी की। बल्कि जीतकर फिर से अपना परचम लहरा दिया।
चुनौती पर विजय पाने की उनकी अद्भुत क्षमता पर किसी को कोई शक नहीं था। पर गैटलिन के सामने चुनौती थी। वे इस पर खरे उतरने से चूक गए। हालांकि खेल में हार जीत हर नया सबक होता है। पर आपके पास जब अवसर होता और आप उसका पूरा लाभ नहीं ले पाते हैं तो उसका मलाल जीवन भर रहता है। फिर भविष्य में आप चाहे कितने ही तमगे हासिल क्यों न कर लें। चुनौती से पार पाने के लिए व्यवहार भी वैसा ही करना होता है। यह बात उसैन ने ट्रैक पर उतरने के बाद से साबित किया था। वे हारते या जीतते यह अलग बात थी। परन्तु व्यवहार में विश्व विजेता की झलक साफ दिखाते रहे। बाकी जितने भी रेस ट्रैक पर एथलीट थे वे दवाब में थे। ऐसा दवाब होना लाजिमी भी है जब आपके सामने विश्व का सबसे तेज दौड़ने वाला एथलीट है और मुकाबले में आपके हारने के सौ प्रतिशत चांस हो।
तो क्या कोई कभी अपराजेय बोल्ट को नहीं हरा पाएगा। ऐसा नहीं है। जय और पराजय हमेशा किसी की स्थाई नहीं होती है। बस उससे पार पाने के लिए आपकी तैयारी, जज्बा कैसा है सब कुछ इसी पर निर्भर करता है। अगर विश्व विजेता बनना है तो व्यवहार भी वैसा ही करना पड़ेगा। तैयारी तो आप करके आएंगे। खेल में रूचि रखने वाले जानते होंगे। बोल्ट और माइक टाइसन के व्यवहार में एक सी समानता है। जब टाइटन रिंग में आते थे तो उनका व्यवहार भी वैसा ही झलकता था। यानि विश्व विजेता का।

बोल्ट का रिकार्ड :  100 मीटर की रेस तीसरी बार जीते हैं। 2009, 2013,2015 में जीते थे ।
गैटलिन का रिकॉर्ड : जस्टिन गैटलिन 28 रेस दो साल से जीतते आ रहे हैं। फिर भी हारे

Saturday, 25 July 2015

याकूब के बाद कोई मदद को नहीं आएगा


राजेश रावत
देश में आतंकी को फांसी होनी चाहिए। इस विषय पर किसी की कोई दो राय नहीं हो सकती है। याकूब के पक्ष में कोई भी नहीं है। पर उस याकूब के पक्ष में देश के अनेक लोग हैं, जिसने कानून की मदद की। जिससे पूरी साजिश का पर्दाफाश हो पाया। साजिश की एक -एक कड़ी जुड़ी। उस अमन पसंद आदमी के पक्ष में लोग है। जिसे अपनी गलती का अहसास हुआ। देश वापस लौटा और सरेंडर किया। उसके इस दावे पर शायद ही किसी को शक हो। यह देश की जांच एजेंसियों पर अविश्वास भी नहीं है। पर उनके काम करने के तरीके जरूर सवाल है। अगर कोई अपराधी सुधरना चाहता है और गलती सुधारना चाहता है तो उसे निसंदेह ही एक मौका मिलना चाहिए। उसे किसी तरह की रियायत मिले। यह शायद ही कोई चाहता हो। पर जिसे भी उसके तर्क से जरा सा भी इत्तेफाक है। वह यह जरूर चाहता है कि सूचना देने वाले को सरंक्षण और गलती सुधारने का मौका सबको मिलना चाहिए। अगर संजय दत्त और उनके जैसे अनेक लोगों को मौका मिला है तो फिर याकूब मेमन को एक मौका क्यों नहीं दिया गया। उसे भरोसे में लेकर एक साजिश के तहत फांसी के फंदे तक क्यों पहुंचाया गया। सवाल उन लोगों पर भी जो आज उसकी फांसी पर विवाद खड़ा कर रहे हैं।
क्यों नहीं उस समय उसकी मदद को आगे नहीं आए। इसमें उन तमाम मानवतावादी संगठनों की नीयत पर भी सवाल खड़ा हुआ है। जो  हर कैदी के अधिकार के लिए लड़ते रहे हैं। उन्होंने कभी इस सच्चाई से परदा क्यों नहीं हटाने की कोशिश की।
देश में मी़डिया पर भी सवाल खड़े होते हैं। जो तमाम तरह की खुफिया रिपोर्ट लीक करती रहती है। समय -समय पर घोटाले उजागर करती हैं परन्तु एक व्यक्ति के खिलाफ रची जा रही साजिश को उजागर नहीं कर पाए।
आज हाय  -तौबा केवल टीआरपी के लिए मचा रहे हैं। सवाल यह भी है कि यह तो एक ऐसा मामला है जो सामने आ गया है। कई ऐसे कई मामले हैं जिनके आरोपी बिना कोई विवाद के फांसी पर चढ़ गए। अभियोजन का काम ही है आरोपी को मुजरिम सिद्ध करना। क्या ऐसी व्यवस्था नहीं बनाई जानी चाहिए। ताकि अगर कोई आरोपी अपने गुनाह को मानकर गलती सुधारने की कोशिश करता है तो उसे एक मौका दिया जाए। उसकी सजा में नरमी बरती जाए। छूट नहीं दी जाए। फांसी देकर हम मदद के रास्तों को बंद कर रहे हैं । वैसे भी दिल्ली हो देश तमाम मामले में कोई मदद को आगे नहीं आता है। दिल्ली में 36 चाकू खाकर दम तोड़ने वाली मीनाक्षी का मामला सबके सामने है। कानून के पचड़े में पड़ने के डर से ही तो कोई उसे बचाने नहीं आया था। अब समय आ गया है कि मददगार के संरक्षण दिया जाए। वर्ना समाज की चौपट होता व्यवस्था पूरी तरह से ही ध्वस्त हो जाएगी।
लोग इसी तरह से फांसी पर चढते रहेंगे और हम मीनाक्षी जैसी केस पर केवल आंसू बहाते रहेंगे। इस दर्द का अहसास हमें तब होगा, जब हमारा कोई इस तरह के हादसे का शिकार होगा। तब तक इतनी देर हो चुकी होगी, तमाम प्रयास के बाद भी लोग सामने नहीं आएंगे।

Wednesday, 22 July 2015

अजीब जंग है यह नजीब जंग के साथ


राजेश रावत (22 जुलाई 2015)
राज्यपाल के दुरुपयोग के मामले कांग्रेस सरकार में सबसे ज्यादा चर्चित रहे हैं। लेकिन उन सभी को पीछे छोड़ते हुए भाजपा ने सत्ता में आते ही राज्यपालों के दुरुपयोग के नए कीर्तिमान बनाने शुरू कर दिए हैं। पहले कांग्रेस द्वारा नियुक्त राज्यपालों को एक एक करके हटाने की मुहीम शुरू की थी। लेकिन बीच में मामला उलझ गया। जब एक राज्यपाल इस्तीफा नहीं देने को लेकर अड़ गए थे। यहां तक कि वे कोर्ट भी चले गए थे।
अभी यह विवाद ठंड़ा भी नहीं पड़ा था कि अब नया विवाद दिल्ली में शुरू हो गया। यह इतना बढ़ गया है कि भाजपा की तमाम अच्छी नीतियों पर भारी पढ़ने लगा है। देश के लोग कांग्रेस के राज्यपाल के दुरुपयोग की कहानी जानते हैं। इसलिए भाजपा राज्यपाल को लेकर कितनी भी सफाई क्यों न दे। लोगों के गले नहीं उतरेगी। क्योंकि यह अटल सत्य है कि राज्यपाल केंद्र सरकार की कठपुतली है। केंद्र जब तब इनके माध्यम से अपने हित साधने की कोशिश करती रहती है। दिल्ली के राज्यपाल नजीब जंग की नीयत साफ भी हो सकती है। परन्तु लोगों के बीच उनकी छबि लगातार बिगड़ती ही जा रही है। प्रधानमंत्री मोदी की इस मामले में चुप्पी उनका उतना ही ज्यादा नुकसान कर रही है। एक समय गुजरात की राज्यपाल से मुख्यमंत्री मोदी का विवाद चला था। परन्तु मोदी सरकार को राज्यपाल ने एक गरिमा के साथ काम करने दिया था। शायद यह बात मोदी भूल गए हैं। उनके रोजमर्रा के काम में तब राज्यपाल कमला बेनीवाल ने इतना दखल नहीं दिया है। पर नजीब जंग हर दिन के कामकाज में जबरदस्त दखलअंदाजी कर रहे हैं।
इसका नया उदाहरण दिल्ली महिला आयोग की नई अध्यक्ष स्वाति मालीवाल को ऑफिस नहीं आने के निर्देश देना है। हालांकि बाद में राज्यपाल कार्यालय ने इस विवाद के बढने के बाद सफाई भी जारी कर दी। लेकिन तय है कि दिल्ली के राज्यपाल नजीब जंग की अजीब जंग चुनी हुई सरकार को लेकर चल रही है। यह उनके पद की मजबूरी भी हो सकती है। क्योंकि जब तक वे भाजपा या मोदी के कहने पर केजरीवाल सरकार के खिलाफ काम करते रहेंगे। तब तक पद पर बने रहेंगे। जैसे ही वे निष्पक्ष होने की कोशिश करेंगे। मोदी सरकार उन्हें अलविदा कर देगी। हालांकि यह भी तय है कि एक समय के बाद मोदी सरकार एलजी नजीब जंग को दर किनार ही कर देंगे।
भाजपा नेता भी नजीब जंग की रोज -रोज की किट किट को भाजपा के लिए नुकसान दायक मानने लगे हैं। उन्हें लगता है कि इससे मीडिया में केजरीवाल को अनावश्यक महत्व मिल रहा है और उनकी टीआरपी लगातार बढ़ रही है। जबकि यह केजरीवाल के स्थान पर यह मोदी को मीडिया में स्थान मिलना था। दिल्ली समेत देश के अन्य हिस्सों में भी केजरीवाल के समर्थन में लोग बात करने लगे है।
अन्ना की कमी को केजरीवाल ने पूरा किया :  यूपीए सरकार ने अन्ना की मांग को नजर अंदाज किया था। उनके आंदोलन को तोड़ने के लिए तमाम हथकंड़े अपनाए थे। उसी की उपज से केजरीवाल सत्ता के सिंहासन तक पहुंचे। अगर यूपीए सरकार मामले को सही तरीके से निपटाती तो आज केजरीवाल का कोई वजूद नहीं होता। अब मोदी सरकार के समय में केजरीवाल परेशान हो रहे हैं। मोदी को भी यूपीए सरकार ने परेशान किया था और वो प्रधानमंत्री बन गए। लोग मोदी को रोकने के लिए केजरीवाल की तरफ देखने लगे हैं। अगर इसी तरह से पांच साल तक चलता रहा तो तय है कि केजरीवाल मोदी के सबसे बड़े राजनीतिक विकल्प बनकर उभरेंगे। केजरीवाल भी इस बात को जानते हैं और उनका सारा ध्यान मोदी को ही टारगेट करने का है। अब कौन कितना सफल हो पाता है यह आने वाले समय में साफ होगा।

Monday, 11 May 2015

फिर याद आ गया धमकी का जमाना


-राजेश रावत
केजरीवाल ने मीडिया के खिलाफ मानहानि का केस करने की धमकी दी। दिल्ली के अधिकारियों को इसके संबंध में निर्देश भी जारी कर दिए हैं। इस खबर के बाद से देश भर का मीडिया बौखला गया है। हालांकि ऐसी कोई बात नहीं है। जो केजरीवाल ने नई की हो। पर मीडिया को लगता है कि केजरीवाल के बहाने बाकी राजनेताओं को भी वे इस तरह के हथियारों के इस्तेमाल करने से रोक सकते हैं।

फोटो : साभार गूगल
कुछ दिनों पहले मीडिया को मोदी ने सलाह दी थी। जमकर आलोचन की थी। मीडिया इससे आहत तो जबरदस्त हुआ था। पर इस तरह से विरोध नहीं कर पाया था। शायद हिम्मत ही नहीं थी। क्योंकि मोदी जी अभी सरकार हैं और इससे भी ज्यादा उनके आर्थिक हित भी नाराजगी ज्यादा नहीं जताने का तकाजा करते हैं। मीडिया डरा कभी नहीं। बस मौके के इंतजार में है। मोदी सरकार के घोटाले और घपले खोजने में जुटा है।

मीडिया को अब दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की धमकी सहन नहीं हो रही है। कैसे एक अदने से दल का नेता जो हाल ही में राजनीति में आया है। उन्हें कैसे धमकी दे सकता है। कई मीडिया हाउस को लग सकता है कि केजरीवाल को उन्होंने ही नेता बनाया है। अब मुख्यमंत्री बनकर उन्हें ही आंखे दिखाने लगे हैं। मीडिया हाउस की बात तो छोड़िए कोई भी इसे सहन नहीं करेगा। आदेश जारी करने से पहले मेरा मानना है कि केजरीवाल यह जानते थे। संभव है दिल्ली के अधिकारियों ने उन्हें इसके संबंध में अपने -अपने अनुभवों की राय भी दी हो। मेरा मानना है कि बहुमत इस हथियार के इस्तेमाल करने को लेकर ही होगा। क्योंकि वर्षों से सरकारें इस हथियार का इस्तेमाल पत्रकारों पर करती आई हैं।

न हथियार की धार बोथराई है और न ही मीडिया या पत्रकार हाउस इससे डरे सहमें है। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी भी इस हथियार को आजमा चुकी हैं। पर इसका दूसरा असर जबरदस्त हुआ है। शायद कम लोग जानते हैं। वह यह है कि फर्जी तरीके से खबरें गढ़ने वाले और उन्हें मीडिया या पत्रकार को हथियार बनाकर इस्तेमामल करने वाले दडबों में छिप जाते हैं। इस बार भी ऐसा ही होगा। केजरीवाल को परेशान और जबरन बदनाम करने वाले एक कोने में जाकर बैठ जाएंगे। क्योंकि वे जानते हैं कि सनसनी के चक्कर में कोई भी मीडिया हाउस और पत्रकार उनकी बनावटी या फर्जी खबर के तथ्य को जांचे बगैर आगे नहीं बढ़ाएगा। जो आगे बढ़ाएंगे। इसकी कीमत भी मुहंमांगी वसूलेंगे।

मतलब पहले 10 गलत और फर्जी खबरें आती थी उनकी संख्या दो हो जाएगी। इनसे निपटना केजरीवाल और उनकी टीम के लिए आसान होगा। केजरीवाल भी यही चाहते हैं। नई सरकार को कुछ काम करने के लिए मिले और मीडिया का ध्यान उनकी तरफ से हट जाए। मीडिया उनका अघोषित बहिष्कार करे। ताकि विरोधियों से निपटने में लगने वाली ऊर्जा को वे कहीं और लगा सकें। बौखलाया मीडिया अब केजरीवाल सरकार के खिलाफ शांत नहीं बैठेगा। बस घोटाले और गड़बड़ियों की पोल खोलने के लिए लू पोल तलाशने में जुट जाएगा। सबूत हाथ में आने के बाद जोर-शोर से मामले को उठाएगा। केजरीवाल इस खतरे को जानते हैं। पर वे इस इसे उठाने को तैयार हैं। क्योंकि इसे उठाए बगैर उनका गुजारा नहीं हो सकता है।

 इतना सब लिखने के पीछे मेरा हरियाणा की चौटाला सरकार के दौरान का अनुभव है। 2000 में जब मैं हरियाणा में था तब चुनाव से पहले और चुनाव के बाद पांच साल के दौरान इसी तरह के वाकये से दो चार हुआ था। इंडियन नेशनल लोकदल की सरकार जो मीडिया फ्रेंडली थी सत्ता में आते ही मीडिया विरोधी हो गई थी।

हमारा अखबार नया था। इसलिए अनेक तरह के हथकंडे हम पर ही अजमाए जा रहे थे। पर हर बार हमारी सतर्कता के चलते कुछ नहीं बिगड़ता था। बाकी मीडिया हाउस भी इसी तरह से चौंकन्ने हो गए थे। तब कुछ पत्रकारों से गलतियां भी हुई और वे सरकार की कोप दृष्टि का शिकार भी बने। पर समय बीतते वही चौटाला सरकार मीडिया फ्रेंडली बन गई । इसमें वहां के अधिकारियों का बड़ा हाथ था। मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला उनके कहने पर ही मीडिया विरोधी और समर्थक बने थे। मेरे कुछ आईएएस और आईपीएस अफसरों से ठीक-ठाक संबंध थे। उन्होंने अनुभव बांटतें हुए बताया था कि कैसे सरकारी अफसरों ने चौटाला को मीडिया से दूरी बरतने के फायदे और मीडिया के साथ चलने के नुकसान बताए थे। यानि उसी तरह से राज्य और अधिकारी बदले हैं पर हथकंड़ा वही अंग्रेजों के जमाने का है। जो अफसरों को उनकी अकादमी में बताया और सिखाया जाता है।

Saturday, 25 April 2015

कालजयी होने की हर नेता की आरजू


राजेश रावत (फोटो : गूगल साभार)
हर नेता दिल में कालजयी होने की आरजू पालकर ही राजनीति करता है। उसका हर काम इसी दिशा में बढ़ता हुआ कदम होता है। परन्तु अपनी जुबान से खुलकर हिम्मत नहीं कर पाता है। यह अलग बात है कि वह अपने दिल के अरमानों को अपने समर्थकों के जरिये जनता के सामने लाता रहता है। कांग्रेस नेता और पूर्व विदेश

मंत्री सलमान खुर्शीद का नया वीडियो ‘कल हो न हो ’भी इसी कड़ी का हिस्सा है। पर इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि अपनी तमन्ना को सलमान खुर्शीद ने बिना किसी लाग-लपेट के सबके सामने लाए और स्वीकार भी किया।
 ‘कल हो न हो ’ वीडियो में सलमान खुर्शीद ने जर्मन राजदूत माइकल स्टैन्स की पत्नी एलिस के साथ रोमांटिक दृश्यों में नजर आए हैं। वे भी अन्य दूसरे नेताओं की तरह ही खुद को कालजयी बनाना चाहते हैं। जैसे एक दौर में भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने किया था। नेहरू को महात्मा गांधी जी से प्रेरणा मिली थी। वे भी यही चाहते थे कि उन्हें गांधी जी के बाद लोग याद करें। हालांकि उन्हें इस बात की जरूरत नहीं थी। क्योंकि वे भारत के पहले प्रधानमंत्री बनकर कालजयी हो गए थे। स्वतंत्र भारत का प्रधानमंत्री बनने के बाद भी उनकी महत्वकांक्षा कम नहीं हुई। वे लगातार इस कोशिश में लगे रहे कि उन्हें गांधी के तुल्य माना जाए। परन्तु वे इसमें सफल नहीं हो पाए। पर इससे नेहरू जी के काम और महत्व कभी कम नहीं हुआ।

अब कांग्रेस नेताओं में सलमान इस कोशिश में जुट गए हैं। वे कई मोर्चों पर सफल तो नहीं हो पाए। साथ के राजनेताओं ने उन्हें हाशिए पर ला खड़ा किया था। यह बात वे जान भी चुके हैं। इसलिए अपने को फिर से मुख्य धारा में लाने के लिए उन्होंने नई कोशिश की है। इसमें कोई बुराई भी नहीं है। परन्तु देश में किसी नेता को इस तरह के रूप में देखने की आदत नहीं है।
 सलमान की कोशिश उन्हें कितना लाभ या नुकसान पहुंचाती है यह तो आने वाले समय में सामने आएगा। परन्तु उनका साहस या यूं कहें दुस्साहस भरा कदम जरूर है। अभी कुछ दिनों पहले ऐसा ही कदम कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने उठाया था। उन्होंने अपने एक टीवी पत्रकार के साथ संबंधों को खुलकर स्वीकारा था। उनकी समय रहते इस स्वीकृति से देश में मचने वाला बड़ा वबंडर जरूर रुक गया था। क्योंकि देश में बड़े नेताओं के लव अफेयर्स अभी भी लोगों आसानी से पचा नहीं पाते हैं।

प्रधानमंत्री मोदी के तमाम अच्छे काम पर लोग भले ही तालियां बजाएं। परन्तु उनका पत्नी को छोड़ना आज भी लोग भूले नहीं है। इसको लेकर लोगों के मन में एक उलझन हैं। वे मोदी का समर्थन करते समय भी उनके इस अध्याय पर बात करने से कतराते हैं और कतराते रहेंगे। ऐसे ही अटल बिहारी को लेकर लोग हमेशा से करते रहे हैं। 

Sunday, 19 April 2015

इतिहास बदलने से क्या सच्चाई बदलेगी

देश में लंबे समय से इतिहास बदलने का मुद्दा उठता रहा है। जब तब इतिहास की अनेक खामियों को गिनाकर इसे बदलने की वकालात करने वाले आवाज बुलंद करते हैं। उनके विरोधी इतिहास को तो़ड़ने मरोड़ने की कोशिश करार देकर विरोध करने लगते हैं। इससे न तो इतिहास बदला जा पा रहा है। और न ही नया लिखने में जितनी ऊर्जा लगनी चाहिए। या प्रयास करने चाहिए नहीं हो पाते हैं। इससे भी ज्यादा भयानक पहलू सामने आने लगा है। वह यह कि इतिहास को लिखने वाले ही इसे हाथ लगाने से डरने लगे है। कुछ अपवादों को छोड़कर। जबकि होना यह चाहिए कि जो बीत चुका और छोड़कर आगे जो अच्छा किया जा सकता है। उसे करने की कोशिश हो। आप नया इतिहास लिख दीजिये। किसी ने आपको रोका नहीं है। आप नया इतिहास लिखते समय इस बात का भी उल्लेख कर सकते हैं कि नया इतिहास लिखने की जरूरत क्यों पड़ी और क्या बदलाव किए गए हैं। इससे आने वाली पीढ़ी को दोनों ही बातों का पता चल जाएगा। जिसे जिस पर भरोसा करना है। वह करे। जिसे नहीं करना है। वह न करें।
किसी को भी इससे कोई आपत्ति नहीं होगी। वैसे भी इतिहास कभी बिना भेदभाव के न तो लिखा गया है और न आगे लिखा जाएगा। हर बार इतिहास को बदलने की कोशिश होती रही है। पहले देश काल और परिस्थितियां अलग थी। अब अलग हैं। अगर ऐसा नहीं होता तो भारत पर या दुनिया के जितने भी देशों पर विदेशी लोगों ने आक्रमण किए उनका ही इतिहास चलता रहता। परन्तु ऐसा नहीं है। जहां भी इस तरह की कोशिश हुई वह विफल ही हुई है। यह इतिहास बदलने और वैसा ही रखे जाने की वकालात करने वाले दोनों ही वर्ग जानते हैं। वे तो बस माहौल बनाने में लगे रहते हैं। ताकि उसकी तरफ लोगों का ध्यान जाए। उनके सत्ता में आने या संघर्ष करने को भी इतिहास में दर्ज कर लिया जाए। जब दोनों पक्ष इतिहास लिखें तो वे इसका जिक्र अपने -अपने हिसाब से करें। मसलन इतिहास बदलने वाले लोग इसकी वकालत करने वालों को महान बताएंगे। वहीं इतिहास बदलने का विरोध करने वाले उन्हें विलेन के रूप में इतिहास में दर्ज करेंगे।
आम आदमी इस बात से कोई सरोकार नहीं रखता है। वह जानता है कि इतिहास न तो बनता है और न ही बनाया जाता है। इतिहास तो खुद व खुद एक समय के बाद बन जाता है। बस उसमें अलग अलग तबकों के नायक और विलेन होते हैं। जिनको लेकर दो पक्षों का अलग -अलग नजरिया होता है।
एक कालखंड की समस्त घटनाएं दूसरे कालखंड का स्वत: ही इतिहास बन जाती है।  इसका लोग अपने हिसाब से ही अंदाज लगाते हैं और आकलन करते हैं। उनके समय में परिस्थितों के बदलने में नजरिया अहम भूमिका निभाता है। इसलिए हर बार इतिहास से खिलावाड़ की कोशिश बंद होना चाहिए।