Wednesday, 15 January 2014

सलमान -मोदी का एक मंच पर आना अच्छा संकेत


गुजरात के मुख्यमंत्री नरेद्र मोदी को कट्टर हिंदू माना जाता है। उन्होंने अनेक मौकों पर इसका प्रमाण भी दिया है। परन्तु पहली बार उन्होंने सलमान के साथ मंच साझा किया। सलमान और मोदी के एक मंच पर आना भले ही अपने -अपने फायदे का नजरिया हो। परन्तु इससे गुजरात के साथ ही देश में एक नया दौर शुरू होगा। जिसे एक अलग तरीके से देखना होगा।

इसमें मोदी की कटी उंगली पर बेंडएज लगाकर सलमान ने अच्छा ही किया। इसे इस तरह से भी देखा जा सकता है कि आपकों घाव देने की जिद हो सकती है। परन्तु हमारी तो फितरत घावों पर मरहम लगाने की है। दूसरा यह भी हो सकता है कि मोदी केवल भ्रामक प्रचार के शिकार हो गए हैं। जो कुछ लोगों ने अपने ही लाभ के लिए किया हो। मोदी ने इसका खुलकर विरोध नहीं किया और कुछ उनके आक्रामक स्वभाव से इस प्रचार को हवा भी मिली। 

मोदी प्रधानमंत्री बनने के लिए किसी भी हद तक समझौता कर सकते हैं। इससे यह तो साफ हो ही गया है। भाजपा भी सत्ता की चाबी के लिए किसी भी मत्था टेकने को राजी है। इसका कारण यह भी है कि दोनों को लगता है कि कांग्रेस के खिलाफ इससे ज्यादा नाराजगी जनता में फिर कभी नहीं होगी। उसने पिछले पांच सालों में जितने अभियान चलाकर कांग्रेस को बदनाम करने की कोशिश की और कुछ काम खुद ही कांग्रेस सरकार और उसके मंत्रियों ने किए। जिससे पूरे देश में कांग्रेस के खिलाफ महौल बन गया।

कांग्रेस सत्ता के नशे में इस नाराजगी को समझ नहीं पाई। उसकी आंख अब खुली है जब चार राज्यों की सत्ता उसके हाथ से खिसक गई। दिल्ली में आप की सरकार बन गई। गांधी परिवार को समझ आ गया कि अब उनके दरबारियों से बाहर के लोगों को एंट्री देनी होगी। पुराने दरबारी सही रिपोर्ट नहीं ला पा रहे हैं। इसके कुछ प्रमाण भी हैं।

मोदी गुजरात में टोपी न पहनने से मुसलमानों की नाराजगी झेल चुके हैं। देश में मुसलमानों की नाराजगी के चलते वे प्रधानमंत्री नहीं बन सकते हैं। क्योंकि देश के आधे से ज्यादा हिंदू मुसलमानों के साथ समान बर्ताव के समर्थक हैं। इसलिए पहली बार आरएसएस के खोल को हटाने की मोदी ने कोशिश की है। भले ही यह कुछ देर के लिए हो या दिखावटी हो। परन्तु इससे मोदी के कटटर एजेंडे से नाराज लोगों को राहत मिली है। उन्हें लगने लगा है कि चलो सबको साथ लेकर चलने की कोशिश तो कर रहे हैं।

मोदी को इस पहल का सकारात्मक लाभ मिलेगा। मोदी के साथ ही भाजपा को भी यह समझ में आ गया है कि देश में केवल साफ्ट नेचर का राजनेता ही प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार माना जाता रहा है। लाल बहादुर शास्त्री, मनमोहन सिंह, अटल बिहारी, राजीव गांधी, नरसिम्हा राव आदि नेता इसके उदाहरण है। अभी हाल में अरविंद केजरीवाल सबसे ताजा उदाहरण है। अगर मोदी आक्रामकता छोड़कर सामान्य और आम आदमी की तरह नजर आने लगेंगे तो उनके समर्थकों का दायरा बढ़ने लगेगा।
राजेश रावत
 15 जनवरी
 भोपाल, मध्यप्रदेश