Tuesday, 7 January 2014

 ब़डे बेआबरू होकर तेरे कूचे से निकले

पश्चिम बंगाल मानवाधिकार आयोग अध्यक्ष जस्टिस एके गांगुली का इस्तीफा हो गया। दिसंबर 2013 में उन पर दुष्कर्म का आरोप लगा था। एक माह से ज्यादा दिनों तक वे पद पर डटे रहे। आरोप कितने सही या गलत थे। इसका फैसला तो होता रहेगा। लेकिन गांगुली ने पद छोड़ने में जो देरी की है। वह ठीक वैसे ही है। जैसे देश में लोगों को न्याय मिलने में होने वाली देरी। यानि देश की जो सबसे बड़ी भरोसे की संस्था है, उसमें बैठने वालों में निर्णय करने में देरी का मामला ही सबसे अहम है।

हालांकि कानून की किताबों में कहा गया है कि सौ गुनाहगार बच जाए। लेकिन एक निर्दोष को सजा नहीं मिलनी चाहिए। परन्तु जब बड़े पदों पर बैठे व्यकि्तयों का मामला हो तो देरी नहीं होनी चाहिए। उसके तीन कारण हैं। पहला  पूरे प्रकरण को मैनेज करने का खतरा। दूसरा आम लोगों के सामने उदाहरण पेश करने की जिम्मेदारी। तीसरा आम आदमी का भरोसा बनाए रखना।

अगर गांगुली पहले दिन ही इस्तीफा दे देते तो शायद उनकी ईमानदारी पर किसी को शक नहीं होता। एक महिला के मामले में उन्हें इतनी उदारता तो दिखानी ही चाहिए थे। उनसे इसकी अपेक्षा भी थी। क्योंकि आरोप लगने के बाद भी तत्काल लोगों को भरोसा नहीं हुआ था। बाद जब घोटालों के मामले में उनके फैसले की जानकारी आम लोगों को लगी तो उनके मन में शंका के बीज पड़ गए थे। जिसका तत्काल इस्तीफा देने से उन्हें लाभ मिलना तय था। इस तरह उन्हें बेआबरू होकर पद भी छोड़ना पड़ता।

लोग जानते हैं कि जिन मामलों में उन्होंने कठोर फैसले सुनाए हैं। उससे प्रभावित होने वाले किसी भी हद तक जा सकते हैं। गए भी होंगे। परन्तु जस्टिस गांगुली के बार बार इस्तीफा देने से इनकार करने से लोगों के भरोसा में टूटा है।

जो जज निडरता के साथ कई लोगों के फैसले अपनी कलम से कर चुका है। वह कठघरे में खड़ा होने से क्यों डर रहा है। माना कि बहुत कुछ मैनेज किया जा सकता है। हुआ भी होगा। परन्तु न्याय न सिर्फ  भरोसा रखना होगा। बल्कि उसमें आस्था भी दर्शाना होगी। तभी तो बुराई से जीता जा सकता है। सदियो से न्याय को मैनेज किया जाता रहा है। परन्तु क्या हर बार न्याय को अपनी बांदी समझने वाले सफल होते हैं। यकीनन ही इसका जवाब नहीं ही है।

अगर एेसा होता तो क्या जिस निडरता से खुद जस्टिस गांगुली फैसला चुना पाए हैं। वे सुना पाते। देश में कई जजों ने भी इसी तरह से फैसले सुनाए हैं। कई को प्रभावित लोगों ने अपने ढंग से परेशान और हैरान किया है। अनेक उदाहरण भरे पड़े हैं। इन सबके बाद भी  जस्टिस गांगुली फैसले ले सके। आगे उनके जैसे दूसरे जज भी एेसे ही कठोर फैसले ही लेंगे। इसकी गति कम भले हो जाए। बंद कभी नहीं होगी। बस समय का इंतजार करिए।  

राजेश रावत

7जनवरी 2014 भोपाल