Wednesday, 9 July 2014

राहत की फुहारों की बजट से उम्मीद


वैसे तो बजट से राहत की कम और टैक्स की ज्यादा उम्मीद होती है। कांग्रेस के शासन में बजट का यही अर्थ आम लोगों को समझ आया था। आम आदमी भारी-भरकम आंकड़ों को नहीं समझ पाता है। वह केवल यह जानना चाहता है कि महंगाई की तपिश से झुलसे उसके घर कुछ राहत की बारिश होगी या नहीं। गुरुवार को वह सावन की फुहार की तरह ठंडक महसूस करना चाहता है। अभी भी मोदी से उसे किसी करिश्मे की उम्मीद है।

वित्त मंत्री अरुण जेटली ने भी रेल मंत्री सदानंद गौड़ा की तरह ही कड़वी दवा पीने की सलाह दी तो वह आम आदमी खुद को ठगा महसूस करेगा। केवल योजना का पिटारा से उसके घर में दाल -रोटी नहीं आने वाली है। रेल बजट से शहरी और कस्बों में रहने वाले निराश हो चुके हैं। किसान मौसम की बेरुखी से परेशान है। अब बारी नौकरीपेशा लोगों की है। उन्हें बजट से आस है। बजट ने राहत नहीं बरसाई तो यूपीए और भाजपा सरकार के कार्यकाल में फर्क करना का मुश्किल हो जाएगा। व्यापारी भी अभी ज्यादा खुश नहीं है। बस उसे केवल इतनी भरोसा है कि कुछ अच्छा हो सकता है। पर भरोसा होता ही टूटने के लिए है। कम तक टूटता है यह समय के साथ स्पष्ट होगा। 

बुधवार को देश भर के टीवी चैनल और विपक्ष के नेता भाजपा अध्यक्ष की नियुक्त की चर्चा में लीन रहे। बजट की पूर्व संध्या को भाजपा ने पूरी तरह से भटका दिया। यह उसकी सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। चुनाव के पूर्व भी वह ऐसी ही रणनीति से देश के लोगों को भटका चुकी है। लेकिन छलावा काम नहीं आएगा। 
सरकार को रणनीति का सहारा छोड़कर ठोस काम करके बताना होगा।  वर्ना वास्तविकता के कठोर धरातल पर काल्पनिक रणनीतियां दम तोड़ देंगी। यह उसी तरह से होगा। जैसे रात के गहन अंधकार में बंद पलकों के नीचे आने वाले मीठे सपने मन को बड़े लुभाते है। पलक झपकाते ही वे अनंत गहराइयों में इस तरह से लीन हो जाते हैं कि कभी थे ही नहीं। देखने वाला उनकी स्मृतियों को अवचेतन में सहेजे हुए रेगिस्तान के मुसाफिर की तरह भटकता रहता है। उसे कभी पानी नहीं मिल पाता है। 

यानी की भाजपा के रणनीतिकारों ने इस बजट में कांग्रेस के सिर पर महंगाई का मटका फोड़ना छोड़ना होगा।  क्योंकि महंगाई से परेशान होकर ही उन्होंने मोदी का दामन थामा था। अब तक यह भी साफ हो गया है कि देश का खजाना खाली नहीं है। विदेशी मुद्रा भंड़ार भी बढ़ा ही है। अब सत्ता मिलते ही अगर मोदी सरकार भी यही राग अलापने लगेगी तो उनका आक्रोश बढ़ जाएगा। अच्छे दिन की भूल भुलैया में उलझने वाला नहीं है।

रेल बजट से जहां उसका भरोसे तड़का था। अब उसकी दरार बढ़ जाएगी। जिसे खाई में तब्दील होते देखना वे भी नहीं चाहेंगे। आम लोग महंगाई से परेशान हैं। वे तो केवल इतना चाहते हैं कि उन्हें राहत मिले। अध्यक्ष कोई बने। बजट कुछ भी आए।  गड़बड़ाते घर के बजट को सुधारने के उपाय देखना चाहते हैं।  

Thursday, 19 June 2014

फीफा में चैंपियन की हार का मतलब

स्पेन की टीम को चिली से जिस तरह से हारी है। वैसे चैंपियन की हार तभी होती है जब वह बेहद आत्मविश्वास के साथ मैदान में उतरे और सामने वाली टीम का आकलन सतही तौर पर करे। सदियों से चैंपियन एेसे ही हारते आए हैं। जब वे अपने को अजेय मानने लगते हैं तभी कोई नया खिलाड़ी आता है और मद में चूर चैंपियन को बड़ी आसानी से हरा देता है। उसकी तमाम कोशिशें और ताकतें काम नहीं आती है।
स्पेन के साथ भी एेसा ही हुआ।बड़े बड़े महारथी अपनी रणनीति के चक्रव्यूह में ही उलझे रहे। स्पेन के आक्रमण ने उसे किले को ध्वस्त कर दिया।
एेसा ही कुछ श्रीकृष्ण ने उस समय कंस  के अखाड़े में किया था जब कंस ने उन्हें मल्लयुद्ध के लिए बुलाया था। कंस के योद्धा अंहकार में थे। कंस भी उनकी शकि्त को कृष्ण की शकि्त से ज्यादा मानकर बेफ्रिक था। जबकि कृष्ण उसकी हर चाल को भांपते हुए आ रहे हैं। वृंदावन से कृष्ण को युद्ध के लिए साथ ला रहे अक्रूर भी तब तक कृष्ण को एक किशोर बालक ही मानकर अपने साथ ला रहे थे। लेकिन कृष्ण ने अखाड़े में सबके आकलन को गलत साबित करके कंस का वध उसकी सेना के सामने ही कर दिया। यानी एक पुराना चैपियन धराशायी हो गया। जिसे हराने की उस दौर में सोचने पर भी उसके विरोधियों को पसीना आने लगता था।

अरविंद की हत्या की आशंका का अर्थ


इसे अरविंद के बयान के बाद लिखा था, पोस्ट १९ जून को किया 


भारत में आम आदमी के नेता अरविंद केजरीवाल ने उद्योगपित अनिल अंबानी के खिलाफ मोर्चा खोला है। वे उद्योग के खिलाफ नहीं है। लेकिन किसी उद्योग के संचालक को जनता को लूटने की छूट देने के खिलाफ है। अभी तक उनकी बातों से सिर्फ इस बात का अंदाजा लगा है। इस आरोप के बाद अब अपनी हत्या की आशंका भी जता रहे हैं। अब तक उन पर कई लोग हमला भी कर चुके हैं। इसका सीधा मतलब है कि केजरीवाल पर हमले के पीछे कुछ लोग हैं। अगर एेसा नहीं होता तो  इस तरह किसी कांग्रेस या भाजपा के नेता को किसी ने चांटा  क्यों नहीं मारा है। मेरा उद्देश्य किसी नेता के साथ मारपीट को प्रोत्साहन देना नहीं है। बल्कि एेसी साजिश रचने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने की मांग है। फिर वह चाहे किसी भी दल से जुड़ा क्यों न हो। अंहिसा के मामले में किसी भी तरह का समझौता देश के हित में नहीं हो सकता है। अरविंद 
 पिछले  दिनों चांटा मारने वाले ऑटो चालक को माफ भी कर चुके हैं। ऑटो चालक का दावा है उसे गुस्सा आया उसने बाकायदा माला पहनाकर चांटा मारा।  महात्मा गांधी की भी इसी तरह से हत्या की गई थी। इसी तरह का एक मामला वर्षो पहले नाइजीरिया में सामने आया था। वहां एक आंदोलनकारी को सजा सैनिक सरकार ने दी थी। तत्कालीन नाइजीरिया के सैनिक शासन ने लेखक -नाटककार और आंदोलनकारी केन सारो वीवा को फांसी की सजा दी थी। उनके साथ ही उनके आठ साथियों को भी फांसी पर लटकाया गया था। इस घटना के बाद 11 नवंबर 1995 को ब्रिटेन की अगुवाई में न्यूजीलैंड में राष्ट्रकुल देशों की बैठक हुई। पूरी दुनिया में वीवा का हत्या की निंदा की गई और उसे राष्ट्रकुल से निलंबित कर दिया गया। लेकिन इसी बीच पर्यावरणवादी संस्था ग्रीन पीस ने एक रहस्य से पर्दा उठाय़ा। ग्रीन पीस के मुताबिक केन सारो वीवा की फांसी के पीछे इंग्लैंड- हालैंड की संयुक्त  पट्रोल उत्पादन कंपनी  का हाथ था।  उस समय भारत में शेल को बर्मा शेल के नाम से जाना जाता था। अभी भी शेल भारत में काम कर रही है। शेल के उत्पादन से नाइजीरिया का पर्यावरण संतुलन बेहद खराब हो गया था। इसके खिलाफ वीवा और उनके साथी आंदोलन चला रहे थे। सैनिक शासन शेल का समर्थक था। उसकी सारी आमदनी कंपनी से ही हो रही थी। ब्रिटेन से उसे हथियार मिल रहे थे। इसमें भी शक नहीं कि कंपनी सैनिक शासन की मदद कर रही थी। फिर सैनिक शासन को उसकी भी मदद करनी थी। सेना को हथियार ब्रिटेन से ही मिल रहे थे। इसका अर्थ भी समझा जा सकता है। 

स्टालिन ने छोटी जोतों को तोड़कर सरकारी सामूिहक फर्मों के उद्देश्य से किसानों से जमीन छीनी थी। विद्रोह करीब ३० लाख किसानों की हत्या की गई थी। रूस में उस समय करोड़ों लोग छोटी जोतों के मालिक थे। यह उदारहण है कि आधुिनक टेक्नोलॉजी जनसंख्या से घबराती है। साम्राज्यवादी टेक्नोलॉजी की कार्रवाई का क्षेत्र व्यापक होता है। यानि उसका आपरेशनल एरिया बहुत विशाल होता है। इसका संचालक दुनिया के किसी भी कोने में बैठकर उसे संचालित कर सकता है। 

Monday, 21 April 2014

देश में इंटरव्यू की बाढ का मतलब कैसे भी जनाधार बढ़ाना



देश में इस समय इंटरव्यू की बाढ़ सी आई हुई है। तमाम राजनेता एक के बाद एक टीवी चैनलों, अखबारों को इंटरव्यू दे रहे हैं। चैनलों के बीच होड़ मच गई है। लेकिन इस होड़ को शुरुआत का श्रेय दैनिक भास्कर को जाता है। राहुल गांधी का पहला इंटरव्यू दैनिक भास्कर में प्रकाशित हुआ था।

इसकी रीडरशिप को समझते हुए दिन भर सारे चैनलों में यह इंटरव्यू दिखाया गया था। हालांकि इससे पहले भी अनेक इंटरव्यू हुए। लेकिन उनका इतना व्यापक असर नहीं था। राहुल गांधी के दूसरा इंटरव्यू भी भास्कर में ही आम आदमी पार्टी नेता के अरविंद केजरीवाल का था। इनको मिले कवरेज के बाद यह दौड़ सरपट भागने लगी थी।

हर चैनल लगातार नेताओँ के इंटरव्यू लेने का प्रयास करने लगा। उससे ज्यादा नेता अपने इंटरव्यू देने को तैयार हो गए। राहुल ने कई चैनलों और अखबारों को इंटरव्यू दिए। पत्रकारों के सवालों से कतराने वाले भाजपा के प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी ने भी पहली बार राजस्थान के ईटीवी चैनल को इंटरव्यू दिया। लेकिन उसकी उतनी प्रतिक्रिया नहीं हुई। कमजोर सवालों के सामने मोदी हावी रहे। उनकी भाव-भंगिमा देखकर सभी इसे प्रचार का पैकेज मानकर देखता रहा।

टाइम्स नाउ चैनल हो या एनडीटीवी या आज तक के स्तरीय इंटरव्यू की तरह उसका प्रभाव नहीं पड़ा। दूसरा इंटरव्यू मोदी ने आपकी अदालत को दिया। उसका कुछ प्रभाव जरूर रहा। चर्चा भी हुई। इसी के बाद ही मोदी मजबूर होकर एबीपी न्यूज चैनल को इंटरव्यू देने को तैयार हुए। देश में इस इंटरव्यू को लेकर थोड़ी ज्यादा उत्सुकता है। अगर सवालों में दम नहीं रहा तो इसका हश्र भी वैसा ही रहेगा। उनके सामने यह चुनौती भी है।
बात इंटरव्यू को लेकर चल रही है तो कोलंबिया की मशहूर गायिका शकीरा की बात न हो तो बात अधूरी ही रहेगी। हालांकि राजनीति से उनका कोई सीधा सरोकार नहीं है। न ही मोदी से किसी तरह की तुलना का यह प्रयास है। यह केवल इंटरव्यू के विषय में जानकारी देने का एक प्रयास है। शकीरा और मोदी में फेसबुक की समानता जरूर है। दोनों के करोड़ों फालोअर हैं। एक दिन में चालीस इन्टरव्यू देने का रिकॉर्ड शकीरा के नाम पर है। इतना ही नहीं किसी भी इंटरव्यू में एक भी बात को उन्होंने दोहराया नहीं था। चाहे व तथ्य हो या सवालों के जबाव। कोलंबिया के बारान्कीया इलाके की रहने वाली इस 25 साल की गायिका की लोकप्रियता देश की सीमाओ से परे जा चुकी है। भारत में भी उनका लाइव शो हो चुका है। वह भी युवाओं के बीच। उन्ही के देश के मशहूर लेखक गाब्रिएल गार्सीया मारकेज ने 8 जून 2002 को शकीरा का इंटरव्यू लिया था। जिसे द गार्जियन अखबार में प्रकाशित हुआ था। इस इंटरव्यू में बताया गया कि शकीरा की व्यस्तता का आलम क्या है। वह करीब दस साल की उम्र से पॉप संगीत की सितारा बनी हुई हैं। 
जबकि देश में जितने भी इंटरव्यू आ रहे हैं। उनमें नेता अपनी हर बात को दोहरा रहे हैं। इसका उदाहरण महाराष्ट्र की नव निर्माण सेना प्रमुख राज ठाकरे के कई चैनलों पर आए इंटरव्यू में आ चुका है। मोदी भी दोहराव से नहीं बच सके। नेताओं से ज्यादा टीवी चैनल के पत्रकारों की कमी का मामला साफ नजर आता है।

इसी कड़ी में सोमवार को 21 अप्रैल 2014 को जीटीवी के पत्रकार सुमित अवस्थी ने जरूर थोड़ा नया नजरिया पेश किया है। वाराणसी के पूर्व सांसद मुरली मनोहर जोशी इंटरव्यू के दौरान उखड़ गए थे। उन्होंने चैनल के टीवी फुटेज भी डिलिट करा दिए थे। इस पूरे मामले का चैनल ने खुलासा कर दिया।