Sunday, 5 January 2014

देश का दुर्भाग्य रामदेव दे रहे हैं देश को दिशा



इस देश का यह दुर्भाग्य है कि रामदेव जैसे लोग देश को दिशा देने का दावा करते हैं। जिसे खुद ही नहीं पता है कि किस दिशा में कब और कहां जाना है। दिल्ली आंदोलन में सलवार पहनकर भागने वाले रामदेव लगातार अपनी छवि को देशभक्त के रूप में पेश करने में लगे हैं। सभी को अधिकार है। उनके अधिकार पर कोई टिप्पणी नहीं है। योग करें। देशभक्त बने। अपनी बात रखें, कोई परेशानी नहीं। परन्तु देश को दिशा देने की कोशिश पर आपत्ति है। लोगों को गुमराह करने का विरोध है। उनकी नीयत पर शंका है।
बाबा रामदेव एक दवा व्यापारी है। भले ही आयुर्वेदिक। डाबर कंपनी की तरह, उनकी भी कंपनी है। नफे और नुकसान का गणित लगाकर भाजपा के प्रत्याशी नरेंद्र मोदी को लगातार ब्लैक मेल कर रहे हैं। यह भी हो सकता है कि यह उनकी और भाजपा की साझा रणनीति हो। एक दिन पहले मोदी से टैक्स पर और अन्य मुद्दों पर राय मांगते हैं। दूसरे दिन मोदी मंच पर होते हैं। उनकी बातों का समर्थन करते हैं। अब इसका क्या मतलब लगाया जाए। या तो दोनों लोगों को बिलकुल ही मूर्ख समझ रहे हैं या दोनों ज्यादा मुगालते में है। लोग सब समझ रहे हैं।

अब बात करते हैं टैक्स की। रामदेव के मुद्दे की। क्या गुजरात में सारे टैक्स व्यापारियों और जनता से नहीं लिए जाते हैं। क्या मध्यप्रदेश, राजस्थान में टैक्स कम है। मध्यप्रदेश में डीजल, पेट्रोल और बिजली के दाम तो देश भर में सबसे ज्यादा है। क्या रामदेव को नहीं पता। फिर क्यों नहीं कहते इन राज्यों की सरकारों से और मुख्यमंत्रियों से कम करने को। जो वे कर सकते हैं। कभी इन प्रदेशों के आम लोगों की चिंता की है। नहीं कि तो फिर उन्हें क्या नैतिक अधिकार है। इस तरह के मुद्दों पर बोलने का।
मतलब साफ है। रामदेव लोगों को गुमराह करने की कोशिश कर रहे हैं। या खुद इतने गुमराह है कि कुछ दिखाई ही नहीं देता है। दूसरा भी कारण हो सकता है। जैसे ही उत्तराखंड में उनके खिलाफ कोई कार्रवाई शुरू होती है वे चैनल पर आ जाते हैं औऱ गड़िरए की तरह चिल्लाने लगते हैं। शेर आया ..शेर आया। भीड़ एकत्र हो जाती है। परन्तु असल में शेर नहीं होता। यह भीड़ भी ज्यादा बार नहीं आएगी।


 यह शायद रामदेव भूल गए हैं। मोदी और भाजपा उन्हें केवल तब तक ही झेल रही है जब तक लोकसभा चुनाव नहीं हो जाते। जैसे ही चुनाव हुए और भाजपा, मोदी उनसे पल्ला झाड़ लेंगे। भाजपा का पुराना इतिहास ही यह रहा है। उदाहरण के लिए मायावती, कल्याण सिंह, उमा भारती के नाम गिनाए जा सकते हैं। लालकृष्ण आडवाणी को भी नहीं भूलना चाहिए। जिसने भाजपा को जिंदा किया उसे एेसे दर किनार किया है वह उस दिन को कोस रहे होंगे। जब उन्होंने भाजपा को सत्ता में लाने के लिए सारी उम्र् ही फूंक दी। कथावाचक आसाराम भी इसी तरह से चिल्लाते रहे हैं। पर आज उनका क्या हश्र हुआ है। सबको पता है।
राजेश रावत 
5 जनवरी 2014
भोपाल