Sunday, 12 April 2015

गलती करने पर माफी मांगना और आपको बड़ा बनाता

राजेश रावत
भोपाल ।गलती करना या होना जाना स्वाभाविक है। परन्तु गलती करने के बाद उसे सुधारते हुए माफी मांगना सबके बूते की बात नहीं है। यह केवल वह ही कर सकता है, जिसका दिल बढ़ा होता है। या जो आगे बढ़ने के लिए पीछे की छोटी बातों को भूलने के लिए तैयार रहता है। आज के युवाओं में गलती को सुधारने की ललक ज्यादा है। शायद यही कारण है कि वे नए नए कीर्तिमान रच भी रहे हैं। परन्तु इसके उलट सयाने लोग आज भी अपनी गलती को मानने को तैयार नहीं होते हैं। या उनकी पोल खुलने से बौखलाकर उस पर पर्दा डालने की कोशिश करने लगते हैं। जबकि वे जानते हैं कि उनके ऐसा करने से भी कुछ नहीं होने वाला है।

गलती मान लेने से उनका कद ही बढ़ेगा। क्योंकि सभी जानते हैं कि गलती किसी उम्र की मोहताज नहीं होती है। इसी तरह से माफी का अवसर हर किसी को नहीं मिलता है। समय पर अगर माफी मांग ली जाए तो उसका असर लंबे समय तक रहता है। दिल से एक बहुत बढ़ा बोझ भी उतर जाता है। आपके विषय में लोगों की सोच बदल जाती है। दायरा बढ़ने से लोग आपके आने से किसी विवाद की वजह से हिचक रहे होते हैं वे फिर उसी रवानगी के साथ आने लगते हैं जैसे कुछ हुआ ही नहीं।

लेकिन आप गलती के बाद भी अगर उसे सुधारने की जगह अड़ जाते हैं तो आप खुद अवरोध बन जाते हैं। अपने और उन लोगों के बीच जो आपके काम और अच्छाईयों के समर्थक होते हैं। वे आपको सही सलाह भी देने से बचने लगते हैं। उन्हें लगता है कि आप कहीं उन्हें भी बेइज्जत न करें। न भी करें तो उनकी राय को उतनी तवज्जों नहीं देंगे। जितनी वह अपेक्षा करता है। इसके दो उदाहरण है। सऊदी में एक युवक ने कचरा बीनने वाली लड़की को देखा। वह कचरा बीन रही थी। लेकिन उसने सऊदी के मशहूर फुटबाल क्लब अल इत्तिहाद की जर्सी पहन रखी थी। बच्ची को देखने वाले उस युवा को शरारत सूझी। उसने अपने मोबाइल से एक सेल्फी लड़की के साथ खींच ली। उसे सोशल मीडिया स्नैप चैट पर पोस्ट कर दिया। कैप्शन लिखा, देखो अल इत्तिहाद कहां पड़ा है।
जैसे ही फोटो पोस्ट हुई लोगों में नाराजगी बढ़ गई। लोगों को लगा कि युवक बच्ची की गरीबी का मजाक उड़ा रहा है। फोटो को वायरल होने लगी पर आलोचना के साथ। लोग युवक पर नाराजगी जताने लगे। स्नेप चैट ने विवाद बढ़ते ही फोटो हटाई। पर फोटो तो वायरल हो चुकी थी। अब युवक को लगा कि उससे गलती हो गई। वह तो फुटबाल क्लब का मजाक उड़ाना चाहता है। उसने लोगों की आलोचन के बाद बच्ची से माफी मांगी और उसे उपहार में गिफ्ट भी दिए। लोगों ने बच्ची की मदद को 75 लाख रुपए दे दिए। इस सबमें युवक ने सबक दिया कि गलती होने पर माफी मांगने से कोई छोटा नहीं हो जाता है।

अब दूसरा उदाहरण देखते हैं। जदयू नेता शरद यादव ने पद्म अवॉर्ड गरीबों को नहीं देने पर सवाल उठाया। उनका सवाल सही भी हो सकता था। परन्तु गलत तरीके से उठाया। मंशा भी गलत ही थी। उनकी सिफारिश को केंद्र सरकार ने दरकिनार कर दिया था। इससे वे आहत थे। इसलिए पद्म अवॉर्ड देने पर सवाल खड़ा कर दिया। अब केंद्र सरकार ने इसका खुलासा कर दिया। केंद्र सरकार को 1878 सिफारिश मिली थी। उसमें से उसने 127 लोगों को चुना। जिन लोगों को पद्म अवॉर्ड मिले हैं। उनमें कोई ऐसा नाम नहीं है। जिसे गलत तरीके से पद्म अवॉर्ड से नवाजा गया हो। मतलब जिन लोगों को पुरस्कार मिले हैं वे योग्य थे। गरीब और अमीर का सवाल ही नहीं था। अब सबकुछ सामने आ गया। तब भी शरद यादव ने अपनी गलती नहीं मानी।

अब कह रहे हैं कि पद्म अवॉर्ड की प्रक्रिया पारदर्शी नहीं है। मतलब वे माफी मांगने को तैयार नहीं है। बस यहीं से उनकी बात कमजोर हो गई। अव्वल तो सिफारिश नहीं करना थी। कर दी थी तो उसे तवज्जों नहीं मिलने की सही मंच पर बात को उठाना था। सार्वजनिक रूप से पद्म अवॉर्ड की आलोचना करने से बचना चाहिए थे। गरीब और दूसरे वर्गों के नाम पर पद्म अवॉर्ड की राजनीति से अच्छे रचनाकारों का अहित ही होगा। पहले से ही अच्छे साहित्यकारों के बीच इस बहस ने बहुत नुकसान किया है। अब जो इसे मुद्दा बनाना चाहते हैं उनके लिए शरद यादव ने फिर मसाला दे दिया है।

Saturday, 4 April 2015

अल्पसंख्यकों के बढ़ते भय का सवाल है जस्टिस कुरियन जोसेफ का

पूरे देश में एक नई बहस छिड़ गई है। इस बहस के जनक हैं सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस कुरियन जोसेफ। उन्होंने ज्वाइंट कांफ्रेंस के आयोजन के समय पर सवाल उठाया है। इसके पक्ष और विपक्ष में अनेक तर्क दिए जा रहे हैं। जिनका अपना -अपना महत्व है। पर सवाल यह है कि इस तरह के सवाल अगर आए हैं तो उनका निराकरण करने के स्थान पर उसे उठाने पर सवाल ज्यादा उठाए जा रहे हैं।
 देश में अल्प संख्यक समुदाय अब अपने को ज्यादा असुरक्षित महसूस करने लगा है। इसका कारण भाजपा की सरकार बनना है। उनका डर जायज ही । भाजपा धर्म को अपना प्रमुख आधार मानती है। संघ के इशारे पर चलती है।  अल्पसंख्यकों को लगता है कि भाजपा देश की धर्म निरपेक्ष छवि को धीरे -धीरे बदलने में लगी हुई है। सरकार के कई फैसले, संघ नेताओँ की दखलादांजी, भाजपा के सहयोगी संगठनों का बढ़ता दबदबा इन सबके डर को पुख्ता करते हैं। इसी डर से जस्टिस जोसेफ का सवाल भी उभरा है। कुछ दिनों पहले ही देश में आतंकवाद से लड़ने वाले पुलिस अधिकारी भी इसी तरह का बयान भी दे चुके हैं। यानि अल्पसंखक समुदाय बेहद घबराया हुआ है। 
वह किसी भी तरह के धार्मिक हमले पर तत्काल तीखी प्रतिक्रिया देने लगा है। भले ही इस तरह के फैसले सहज प्रक्रिया का कोई हिस्सा भले ही। उनका डर तत्काल प्रतिक्रिया दे रहा है। जबकि ऐसा नहीं है। न ही देश की धर्मनिरपेक्ष छवि को नुकसान पहुंचाया जा सकता है। क्योंकि कागजों में कुछ भी बदल दिया जाए। लोगों की भावनाएं, आदतें कैसे बदल जाएगी। आम आदमी आज भी पैदा होते ही धर्म निरपेक्ष माहौल में रहता है। वह तमाम कोशिश भी कर ले तो भी धर्म निरपेक्षता को दर किनार नहीं कर पाता है।
यह हमारे देश की विशेषता भी है। पग- पग पर धर्म निरपेक्षता के उदारहण मिल जाएंगे। ऐसा नहीं है कि धर्म निरपेक्षता को समूल नष्ट करने वाले चुप बैठे हैं। वे अपनी तरफ से लगातार कोशिश करते रहे हैं और करते भी रहेंगे। परन्तु कुछ लोग तात्कालिक प्रभाव में आकर उनका साथ भी दें सकते हैं। परन्तु बहुसंख्यक समुदाय उनके बहकावे में नहीं आएगा।
इसलिए इस तरह के सवाल पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। अल्प संख्यक के भय को दूर करने की जरूरत है। पर सावधानी के साथ। कहीं अल्प संख्यक के नाम पर इस तबके का शोषण करने वाले गलत लाभ न उठा लें। अभी तक यही होता आया है। अल्प संख्यक के डर का शोषण ज्यादा किया गया है। इतिहास इसके अनेक उदाहरणों से भरा पड़ा है। केवल उनके घटते मनोबल को बढ़ाने से ही सारी समस्या का निराकरण हो जाएगा। हर सरकार के समय इस तरह के डर का वातावरण बनता है।
जब कांग्रेस आती है तो बहुसंख्यक खुद को असुरक्षित महसूस करने लगता है। उसे लगता है कि उसकी तमाम सही बातों को भी वोट की राजनीति के लिए नजर अंदाज किया जाएगा। जबकि ऐसा नहीं है। सरकार कोई भी रहे। उसे सभी समुदाय के लोगों की जरूरत होती है। सबके हितों की रक्षा के लिए वह निरपेक्ष भाव से करती है। पर इस बात से इनकार नहीं है कि कुछ सरकार में बैठे लोग सांप्रदायिक ताकतो का बेजा इस्तेमाल अपने हित के लिए करते आए हैं। वे पहले भी थे और अब भी हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने अब दोहरी चुनौती है। वे बहुसंख्यक के बढ़ते उत्साह को कैसे काबू में रखते हैं और अल्प संख्यकों के मन में आए भय को कैसे दूर करते हैं। अगर वे इस चुनौती पर खरे उतरते हैं तो निसंदेह आने वाले समय में उनके समकक्ष कोई खड़ा भी नहीं हो सकेगा।

Saturday, 28 March 2015

राजनीति सत्ता के आसन पर रंग दिखाती है

राजनीति महा ठगनी होती है। यह सत्ता के आसन पर चढ़ते ही सभी भेद और अहसान भूूल जाती है। इसी के भय से आम आदमी हमेशा राजनीति से दूरी बनाए रखता है। लेकिन आम आदमी पार्टी के आने के बाद इस मिथक के टूटने का क्रम शुरू हुआ था। लेकिन 28 मार्च 2015 को यह मिथक दरक गया।जिसकी भरपाई करने में बरसों लगेंगे। आम आदमी अब देश में किस तरह से अलग राजनीति का दावा करेगी। यह उसे समझ नहीं आ रहा है। क्या वह इस तरह के व्यवहार के लिए इसका समर्थन कर रहा था। कतई नहीं। तो साफ है कि जो लोग इस पार्टी से जुड़ रहे थे। वे अब कन्नी काटने लगेंगे। इसमें दोनों गुटों की जबरदस्त कमजोरी सामने आई है।
 इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण किसी गुप्त एजेंटे पर काम करते हुए पूरी पार्टी को रसातल में ले जाने में जुटी हुई है। अगर एेसा नहीं है तो उन्हें कुछ दिनों तक इंतजार क्यों नहीं किया। अरविंद केजरीवाल को उनकी मनमानी करने का अवसर देते जिससे वे खुद ही लोगों के सामने एक्सपोज हो जाते। अगर वे पाक साफ होते तो चुप रहते। आम आदमी पार्टी को सड़क पर तमाशा बनने से रोकते। लेकिन उन्होंने या प्रशांत भूषण ने ऐसा नहीं किया। इससे उन पर उठे संदेह से वे बरी नहीं हो सकते हैं। कई ऐसे उदाहरण है जिससे  दोनों के पार्टी विरोधी काम की पुष्टि होती है।  हालांकि आप को इस स्टेज में लाने में उनकी भूमिका को कम नहीं आंका जा सकता है। वे हर संकट में अरविंद के साथ खड़े रहे हैं। अब ऐसा क्या हो गया कि वे दरकिनार किए जा रहे हैं।
अरविंद केजरीवाल की गलती कम नहीं है। उन्हें बडप्पन दिखाकर इन लोगों को गलतियों को माफ करना था। इन्हें किनारे लगाना था तो बड़ी सफाई से कर सकते थे। लेकिन वे एक अपरिपक्व नेता की तरह व्यवहार करके खुद ही नए विवादों में उलझ गए हैं।

इस दिन को आम आदमी पार्टी के इतिहास का ऐसा दिन है। जिसे याद करके आप का हर कार्यकर्ता खुद शर्मिंदा महसूस करेगा। इसलिए नहीं कि महत्वकांक्षा के पहाड पर खड़े उसके नेता आपसे से छुटभैय्या नेताओं की तरह से लड़ रहे थे। बल्कि इस बात से शर्मसार होगा कि नेता आम आदमी के लिए नहीं लड़ रहे थे। बल्कि वे आपस में एक दूसरे के खिलाफ आरोप लगाकर लड़ रहे थे। इससे आहत लोगों के पास इस बात का कोई जवाब नहीं कि जिस पार्टी के साथ वे खड़े हुए थे। आज वह अन्य राजनैतिक दलों के समान ही व्यवहार कर रही थी। उसके बड़े से बड़े नेता भी आम राजनेताओं की तरह से छोटी छोटी बातों पर लड़ रहे थे। इससे उनका भरोसा टूटा है।

देश के लोगों ने भाजपा और कांग्रेस के कार्यकर्ताओं लड़ते हुए देखा है। अपने समर्थकों को दूसरे नेता को नीचा दिखाने के लिए मंच पर कपड़े तक फाड़ने के लिए उकसाते हुए देखा है। कांग्रेस में सीता राम केसरी को किस तरह से बाहर निकाला गया था। वह घटना कांग्रेस से जुड़े लोगों को याद होगी।
अभी हाल ही में भाजपा से लालकृष्ण आडवाणी की किस तरह से छुट्‌टी हुई है। वह घटनाक्रम सभी को याद होगा। भाजपा को जिस नेता ने इस स्तर तक पहुंचाया है। उन्हें बड़े बेआबरू करके बाहर का रास्ता दिखाया गया था।

Friday, 27 March 2015

आप में घमासान यानी नौ सीखिये राजनेता बनने की जुगत में

27 मार्च को आप नेता और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के खिलाफ एक नया ऑडियो स्टिंग आया। परे मीडिया जगत में इसे हाथों हाथ लिया। मीडिया अरविंद की हर गतिविधि को आखिर इतना महत्व क्यों देता है। इसके दो जवाब हो सकते हैं। मेरा मानना है कि पहला यह कि मोदी की लहर को रोकने वाले नेता हैं। इसलिए मोदी के कद बराबर उनकी हर गतिविधि की उतनी ही टीआरपी है। जितनी मोदी जी की।
दूसरा कारण मेरी नजर में मीडिया का उन्हें अपना क्रिएशन मानना भी है। जैसा कि ज्यादातर विरोधी नेता कहते भी हैं। मीडिया मानता है कि केजरीवाल को उन्होंने नेता बनाया है। केजरीवाल इस मुकाम पर उसकी बदौलत पहुंचे हैं। इसलिए दूसरी पार्टी के नेताओं के कवरेज को लेकर उन्हें जो सतर्कता बरतनी पड़ती है। वह केजरीवाल को लेकर नहीं बरतनी पड़ती है। अच्छे में तो कोई बांदा ही नहीं है। लेकिन विरोध में चलने वाली खबरों पर केजरीवाल को समझा सकते हैं। और वे समझ भी सकते हैं। बशर्ते अन्य नेताओँ के मुकाबले।
इन दोनों ही कारणों के चलते केजरीवाल को मीडिया से ज्यादा तवज्जो मिलती है। इसमें एक तीसरा कारण भी स्वत : ही जुड़ गया है।
वह है मोदी या राहुल, सोनिया, मनमोहन से पनपी दूरी। यानी मोदी या अन्य नेता वे मीडिया का इस्तेमाल अपने तरीके से करते हैं और करते रहेंगे। वहीं इनको अपना महत्व समझाने के लिए मीडिया केजरीवाल का उपयोग करता है। हालांकि यह अलग बात है कि इन तीनों से कभी केजरीवाल को लाभ होता है तो कभी नुकसान भी होता है। जब नुकसान होता है तो केजरीवाल भी अन्य नेताओं की तरह भड़कने लगते हैं। लेकिन वे यह भी जानते हैं कि मीडिया से ज्यादा दूरी उनकी सेहत के लिए नुकसानदायक है। इसलिए ज्यादा लाभ के लिए कम नुकसान को सहन करने की नीति पर वे अमल करते रहते हैं। इसका उन्हें यह भी लाभ है कि दूसरे राजनीतिक दल उनके नुकसान करने से पहले सौ बार सोचते हैं।
दिल्ली के नतीजे से सभी राजनीतिक दल सामने से केजरीवाल पर हमले या किसी तरह की टिप्पणी से बचते हैं? परदे के पीछे से वे उनके विरोधियों को हवा देने में कोई कसर नहीं छोडते हैं। जब तक वे लोग केजरीवाल पर हमला करने से नहीं चूकते है। इसी साजिश का एक हिस्सा नया आडियो टेप है। अगर यह आडियो टेप सही है तो इसमें केजरीवाल ने जिन शब्दों का इस्तेमाल किया है। वे कतई मान्य नहीं हो सकते हैं। लेकिन केजरीवाल आम आदमी है। जब उन्होंने चुनाव लड़ने का विचार किया था। तभी से परेशान करने की कोशिश शुरू हो गई थी। जो अब तक जारी है। इतने हमले होने के बाद कोई भी विचलित हो जाएगा। अगर केजरीवाल विचलित हुए हैं तो नया नहीं है। आखिर आम आदमी इसी तरह से भड़कता और बोलता है।
यह स्टिंग जारी होने से उन्हें परेशान करने की तमाम कोशिशों का पर्दाफाश भी हो गया है। केजरीवाल बार बार गलती कर रहे हैं। दूसरे राजनीतिक दल चाहते हैं कि वे इसी तरह की गल्ती करते रहें और उन्हें जनता की नजरों से गिराया जा सके। शब्दों के इस्तेमाल का पाखंड करने वाले उन तमाम झूठे वादों, बातों को भूल जाते हैं जिनका अब तक राजनेता प्रयोग करते आए हैं। केजरीवाल को समझना होगा कि वे एक प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं। उन उन्हें निशाना बनाया जाएगा ही। सभी राजनीतिक दल केजरीवाल को निशाना केवल इसलिए बनाना चाहते हैं कि कोई नया केजरीवाल पैदा न हो जाए। जो इस राह में आने की सोच रहा हो वह समझ जाए कि यह रास्ता कैसा है। राजनेताओं ने इस रास्ते पर आने वाले हर नए शख्स को हमेशा निशाना ही बनाया है।

उनकी इस तरह की हरकतों से ही 50 साल से लोग नेता बनने से डरते थे। केजरीवाल पहले आदमी हैं जिन्होंने इस मिथक को जड़ से मिटा दिया है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण किरण बेदी और अन्ना हजारे हैं।

Saturday, 1 November 2014

महाराष्ट्र में भाजपा की जीत का मतलब

महाराष्ट्र में भाजपा का विधानसभा चुनाव में सफल होना एक शुभ संकेत है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक करिश्मा किया है। जिसका देश का हर सेकुलर कायल हुआ है। इसके अनेक कारण है। पहला और सबसे बड़ा कारण है महाराष्ट्र से जातिवाद और क्षेत्रवाद की राजनीति के खात्मे की शुरुआत। आमची मुंबई नारे को पूरे महाराष्ट्र के लोगों ने एक सिरे से नकार दिया है। इसका मतलब यह नहीं है कि वह मराठी या महाराष्ट्रीय होने से गुरेज कर रहे हैं। बल्कि वे हिंदुस्तानी होने का प्राथमिकता दे रहे हैं। बाकी देश की तरह ही शांति और सदभाव से रहना चाहते हैं।
शिवसेना औऱ मनसे को झटका ः पिछले पांच साल में महाराष्ट्र में मनसे और शिवसेना जिस तरह से क्षेत्रवाद के नाम पर जहर उगला और लोगों का जीना मुहाल कर दिया। उत्तर भारतीयों पर जो हमले किए। उससे उनका कितना नुकसान हुआ यह तो वे ही जाने आम मराठी का जरूर नुकसान हुआ। जो क्षेत्रवाद, भाषावाद के नाम पर राजनीति करने वाले नहीं देख पाए थे। आम मराठी लोगों को लाठियों से पिटते हुए नहीं देख पाए।

जितनी पीड़ा मनसे, शिवसेना के कार्यकर्ताओं की पिटाई से उत्तर भारतीयों को हुई। उतनी ही पीड़ा आम मराठी भी महसूस कर रहा था। वह खुलकर भले ही नहीं बोल रहा था। पर सहभागी जरूर था। उसे मौका मोदी के रूप में मिला। उसने क्षेत्रवाद की राजनीति को सिरे से खारिज कर दिया। राज ठाकरे इस सदमे से उबर ही नहीं पा रहे हैं। 
मोदी ने गुजरात की  गलती फिर दोहराई
भाजपा नेता नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बने से पहले कुछ लोगों को देश में सांप्रदायिक तनाव बढ़ने की आशंका थी। देश का एक वर्ग इसका लगातार विरोध कर रहा था। परन्तु बहुसंख्यक वर्ग मोदी के इस रूप को नजर अंदाज करके समर्थन देता रहा। उन्हें भारी बहुमत से प्रधानमंत्री बना दिया।  केंद्र सरकार ने ८४ दंगा पीड़ितों को ५ लाख मुआवजा देने की घोषणा की। मुआवजा की रकम बढ़ने से किसी को कोई आपत्ति नहीं है। उन्हें न्याय मिले इससे भी किसी को कोई परेशानी नहीं होगी। परन्तु दिल्ली चुनाव के एेन पहले इस तरह के फैसले का सीधा मतलब लगाया जा सकता है। हालांकि दिल्ली के साथ ही मोदी ने पंजाब पर भी निशाना साध लिया है। वहीं उन लोगों की आशंका भी सच साबित हो गई है कि मोदी चाहे विकास की कितनी ही बात कर लें। परदे के पीछे से वे सांप्रदायिक एजेंडे को ही आगे बढ़ाएंगे। मोदी देश में सेकुलर लोगों की लगातार आलोचना से पीड़ित हैं। पिछले दिनों विश्व मंच पर वे इसे जाहिर भी कर चुके हैं।

मतलब साफ है मोदी सबके नेता, जन नेता , देश समाज और वर्ग से आगे का नेता, जैसे महात्मा गांधी, भगत सिंह, सरदार वल्लभभाई पटेल बनना चाहते हैं। स्वीकार किए जाने की आकांक्षा भी रखते हैं। परन्तु अपनी कार्यशैली भी अपनी सुविधा के अनुसार ही बनाए रखना चाहते हैं। वह भी अपनी शर्तों पर। जो विश्व में कभी भी कहीं भी संभव नहीं है। आप अपनी सुविधा से अपनी नीतियां और कार्यप्रणाली जब तय करते हैं तो पहले उस पर किसी को भरोसा नहीं होता। आप थोड़ा सफल होते हैं तो उस नीति के समर्थक बढ़ते हैं। स्वीकारता के लिए आप पहला कदम बढ़ाते हैं। मोदी के साथ भी यहीं हुआ। अमेरिका दौरे के समर्थन से उन्होंने पहला कदम बढ़ाया था। कुछ अच्छे फैसलों की चमक से दूसरा कदम रखने से पहले वे लड़खड़ा गए। 

८४ के दंगा पीड़ितों का मुद्दा उछालकर उनकी सबसे बड़ी गलती है। हो सकता है दिल्ली चुनाव में इसका उन्हें तात्कालिक लाभ मिल जाए। पर जो लोग उनमें एक जननेता की छवि देखने का प्रयास कर रहे थे उसे जबरदस्त धक्का लगा है। आज मोदी इसे माने या न माने पर सच्चाई यही है। आने वाले समय में उन्हें इसकी भरपाई भी करना पड सकती है। क्योंकि किसी भी समाज में सांप्रदायिकता एक हद तक ही चल पाती है। जैसे ही उसका रूप विकृत होना शुरू होता है। सारा दोष उसी के माथे मढ़ दिया जाता है। भाजपा भी उनके साथ आने वाले समय में यही कर सकती है। आडवाणी इसके उदाहरण हैं। कट्टरता के रथ से वे आगे तो बढ़ गए थे। भाजपा को एक अळग पहचान भी दिलाने में सफल हो गए थे। परन्तु कभी जननेता की छवि नहीं बना पाए थे। उनका समय चुकते ही उन्हें दर किनार कर दिया गया। हर कट्टर वादी के साथ हमेशा से एेसा ही हुआ है। सेकुलर बनने की चाह में आडवाणी जिन्ना की मजार पर माथा टेककर विवादित बयान तक दे बैठे। 

एक समय के बाद मोदी में जब जननेता बनने की उत्कंठा बढ़ेगी। तब वे भी इसी तरह के कदम उठाने की कोशिश करेंगे। वह कोशिश इमानदार होगी। पर कोई भी उस पर भरोसा नहीं कर पाएगा। कारण साफ है गुजरात दंगों का दाग कभी साफ होगा नहीं। उसे लोग भूल भी जाते। पर अब ८४ की सालों पुरानी शांत चिंगारी को हवा देने की उनकी कोशिश कभी माफ नहीं होगी। यह नेहरू की तरह की एतिहासिक भूल मानी जाएगी। 
१ नवंबर २०१४ 

Monday, 4 August 2014

vidrohe: राहत की फुहारों की बजट से उम्मीद

vidrohe: राहत की फुहारों की बजट से उम्मीद: वैसे तो बजट से राहत की कम और टैक्स की ज्यादा उम्मीद होती है।  कांग्रेस के शासन में बजट का यही अर्थ आम लोगों को समझ आया था।  आम आदमी भारी-भर...